हर किसी की जन्मपत्री में ग्रहों की कमजोर और बलवान दशा के अनुसार ही भाग्य में परिवर्तन आता रहता है. अशुभ ग्रहों को शुभ बनाना या शुभ ग्रहों को और अधिक शुभ बनाने के लिए लोग तरह-तरह के उपाय करते हैं.

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इसके लिए कोई मंत्र जाप, दान, औषधि स्नान, देव दर्शन आदि करता है. ऐसे में रत्न धारण एक महत्वपूर्ण एवं असरदार उपाय है. जिससे आपके जीवन में आ रही समस्‍त परेशानियों का हल निकल जाता है.

लेकिन रत्‍न धारण करने से पहले यह देखना जरूरी होता है कि वो शुद्ध है या नहीं. साथ ही साथ उन्हें पहने के लिए जो नियम बताए गए हैं उनका पालन करना भी जरूरी है. ज्‍योतिष के अनुसार, नौ ग्रहों में किसी ग्रह के कमजोर होने पर अक्सर रत्न धारण करने की सलाह दी जाती है, लेकिन इनका प्रभाव तभी होता है जब इन्हें ठीक प्रकार से धारण किया जाए.

कुछ सावधानियां अनिवार्य
कहते है कि रत्न स्वयं सिद्ध प्रकृति का अनमोल उपहार हैं. पृथ्वी पर मनुष्य ने अपनी हर समस्या का समाधान ढूंढ लिया है, समाधान चाहे वैज्ञानिक हो या तांत्रिक या ज्योतिष या कोई और परन्तु उसे हमेशा सावधानीपूर्ण ही करना चाहिए. ज्योतिष विद्या के अनुसार, रत्न धारण करने से मनुष्य की समस्याओं का समाधान हो जाता है. रत्न धारण करना कहने को तो अंगूठी पहनाने के समान आसान है परन्तु रत्न धारण में कुछ सावधानियां अनिवार्य है.

किस दिन कौन सा रत्‍न करें धारण
माणिक्य : रविवार
मोती : सोमवार
पीला पुखराज : गुरुवार
सफ़ेद पुखराज : शुक्रवार
लाल मूंगा : मंगलवार
पन्ना : बुधवार
नीलम : शनिवार
गोमेद : शनिवार
लहसुनिया : शनिवार

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रत्न धारण करने से पहले यह देख लें कि कहीं 4, 9 और 14 तिथि तो नहीं है. इन तारीखों को रत्न धारण नहीं करना चाहिए. यह भी ध्यान रखें कि जिस दिन रत्न धारण करें उस दिन गोचर का चंद्रमा आपकी राशि से 4,8,12 में ना हो. अमावस्या, ग्रहण और संक्रान्ति के दिन भी रत्न धारण ना करें.

इस बात का भी रखें ख्‍याल
1. किसी भी रत्न को अंगूठी में जड़वाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए. जिस अंगूठी में आप रत्न को जड़वाना चाहते हैं, उसका नीचे का तला खुला होना चाहिए और आपका रत्न उस खुले तले में से हल्का सा नीचे की तरफ निकला होना चाहिए, जिससे कि वह आपकी उंगली को सही प्रकार से छू सके. अपने से संबंधित ग्रह की ऊर्जा आपकी उंगली के इस सम्पर्क के माध्यम से आपके शरीर में स्थानांतरित कर सकें.
2. अपने रत्न से जड़ित अंगूठी लेने से पहले यह जांच लें कि आपका रत्न इस अंगूठी में हल्का सा नीचे की तरफ़ निकला हुआ हो. अंगूठी बन जाने के बाद सबसे पहले इसे अपने हाथ की इस रत्न के लिए निर्धारित उंगली में पहन कर देखें ताकि अंगूठी ढीली अथवा तंग होने की स्थिति में आप इसे उसी समय ठीक करवा सकें.
3. इसके पश्चात रत्न का शुद्धिकरण और प्राण प्रतिष्ठा की जाती है. इस चरण में विशेष विधियों के द्वारा रत्न को प्रत्येक प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त किया जाता है. शुद्धिकरण और प्राण प्रतिष्ठा के विधिवत पूरा हो जाने से रत्न की सकारात्मक प्रभाव देने की क्षमता बढ़ जाती है. रत्न प्रत्येक प्रकार की संभव अशुद्धियों और नकारात्मक उर्जा से मुक्त हो जाता है.
4. शुद्धिकरण और प्राण प्रतिष्ठा हो जाने पर अंगूठी को प्राप्त कर लेने के पश्चात् इसे धारण करने से 24 से 48 घंटे पहले किसी कटोरी में गंगाजल अथवा कच्ची लस्सी में डुबो कर रख दें. कच्चे दूध में आधा हिस्सा पानी मिलाने से आप कच्ची लस्सी बना सकते हैं किन्तु ध्यान रहे कि दूध कच्चा होना चाहिए अर्थात इस दूध को उबाला न गया हो.
5. गंगाजल या कच्चे दूध वाली इस कटोरी को अपने घर के किसी स्वच्छ स्थान पर रखें. घर में पूजा के लिए बनाया गया स्थान इसे रखने के लिए उत्तम स्थान है. किन्तु घर में पूजा का स्थान न होने की स्थिति में आप इसे अपने अतिथि कक्ष अथवा रसोई घर में किसी उंचे तथा स्वच्छ स्थान पर रख सकते हैं. यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि इस कटोरी को अपने घर के किसी भी शयन कक्ष में बिल्कुल न रखें.
6. इसके पश्चात इस रत्न को धारण करने के दिन प्रातः उठ कर स्नान करने के बाद इसे धारण करना चाहिए. वैसे तो प्रात: काल सूर्योदय में रत्न धारण करें

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