Krishna Janmashtami 2018: इस बार 2 सितंबर को स्मार्त कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी और 3 सितंबर को वैष्णवों के लिए कृष्ण जन्मोत्सव का त्योहार मनाया जाएगा. कृष्ण योगेश्वर हैं. उनका जीवन लीलाओं के भरा पड़ा है. इसकी शुरुआत कृष्ण ने जन्म के समय से ही कर दी थी. जन्म कृष्ण जन्माष्टमी का मौका हो तो उनकी बाल-गोपाल का चेहरा ही उभर कर सामने आता है. जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में हम आपके लिए लेकर आएं हैं श्री कृष्ण जन्म की कथा.

Krishna Janmashtami 2018: कब मनाई जाएगी जन्माष्टमी, 2 या 3 सितंबर को? जानिये

रात के वो तीन पहर

जन्माष्टमी की कथा कुछ ऐसी है कि द्वापर युग में जब पृथ्वी पर बोझ बढ़ने लगा तो उन्होंने श्री नारायण से गुहार लगाई. धरती मांं की गुहार पर प्रभु ने उन्हें वचन दिया कि एक और अवतार लेंगे और यहीं से शुरू होती है लीला प्रधान श्री कृष्ण के अवतार की कथा. वसुदेव नवविवाहित देवकी और कंस के साथ गोकुल जा रहे थे तभी एक आकाशवाणी हुई कि कंस! जिस बहन को इतने प्यार से तू लेकर जा रहा है उसके गर्भ का 8वांं पुत्र तेरा काल होगा. इसके बाद कंस ने एक के बाद नंद और देवकी के सात पुत्र मार दिए और फिर अवतार लिया भगवान श्री कृष्ण का. इसी के उपलक्ष्य में हम जन्माष्टमी का त्यौहार मनाते हैं.

Krishna Janmashtami Quotes: श्रीमद् भगवत गीता से श्रीकृष्ण के 10 Quotes

भादो की आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में शंख, चक्र, गदाधारी भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया. उनके जन्म के समय उस कारागार की छठा भी स्वर्ग जैसी हो गई जहांं वसुदेव और देवकी बंद थे. नारायण की यह लीला देखकर देवकी और वसुदेव अभीभूत हो गए. उसके बाद श्री कृष्ण ने वसुदेव को निर्देश दिए और बाल रूप में आ गए. इसके बाद कारागर में अद्भुत घटनाएंं हुईं. वसुदेव की हथकड़ियांं खुल गईं. सारे द्वार पाल सो गए. वसुदेव कृष्ण को उठाकर वृंदावन की ओर चल दिए.

रास्ते में यमुना पड़ती थी. वो भी भादो की उफनती यमुना. वसुदेव यमुना पार कर ही रहे थे कि मांं यमुना कृष्ण के चरण छूने के लिए मचल उठी. वसुदेव टोकरी को जितना ऊपर उठाते यमुना उतना ही ऊपर आती जाती. एक वक्त ऐसा आया जब वसुदेव के सर के ऊपर तक यमुना का जलस्तर बढ़ गई. इसके बाद श्रीकृष्ण ने अपना पैर नीचे लटका दिया और यमुना चरण छूकर सिमट गईं.

Krishna Janmashtami 2018: जन्माष्टमी पूजा की सामग्री और विधि

आधी रात के अगले पहर वसुदेव महाराज नंद के घर पहुंंचे और उनकी नवजात बच्ची को उठाकर उनकी जगह कृष्ण को रख दिया और वापस चले आए. वापस आकर कारागार का सारा दृश्य फिर पहले जैसा हो गया. उनकी हथकड़ियांं लग गईं. पहरेदार जाग गए. आधी रात के तीसरे पहर जब कंस को पता चला कि देवकी के पुत्री पैदा हुई है तो वो कारागार आया, लेकिन माया स्वरूपा कन्या का वो कुछ नहीं कर सका. उसके बाद कृष्ण की लीलाएंं चलती रही.

श्री कृष्ण की जन्मलीला कई मायनों में उनके जीवन की पहली और सबसे महत्वपूर्ण लीला थी. श्री कृष्ण की उसी छटा को याद करते हुए हम जन्माष्टमी मनाते हैं. इस बार उसी रोहिणी नक्षत्र में जन्माष्टमी पड़ रही है. एक बार फिर से जन्माष्टमी की ढेर सारी शुभकामनाएंं.

धर्म और आस्‍था से जुड़ी खबरों को पढ़ने के ल‍िए यहां क्‍ल‍िक करें.