देश भर में मंगलवार को जहां बुराई के प्रतीक रावण का दहन कर दशहरा पर्व मनाया गया, वहीं हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में सप्ताह भर चलने वाले दशहरा उत्सव की शुरुआत हुई है.

धार्मिक उत्साह के बीच मंगलवार को कुल्लू दशहरा उत्सव के लिए 200 से अधिक देवी-देवताओं की प्रतिमाएं एक साथ लाई गईं.

देश के बाकी हिस्सों में जहां विजयादशमी पर दशहरा उत्सव समाप्त हो जाता है, वहीं सदियों पुराना कुल्लू दशहरा समारोह विजयादशमी के दिन ही शुरू होता है.

समारोह के एक आयोजक ने बताया, “200 से अधिक देवी-देवता आ चुके हैं. यह निमंत्रण 330 देवी-देवताओं को दिया गया था.” देश के अन्य हिस्सों के विपरीत यहां रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले नहीं जलाए जाते हैं.

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यहां 14 अक्टूबर को ब्यास नदी के तट पर लंका दहन समारोह के दौरान इकट्ठे हुए देवताओं द्वारा एक खास प्रक्रिया से ‘दुष्ट साम्राज्य’ को नष्ट कर दिया जाएगा. दशहरा समारोह के पहले दिन कुल्लू शहर के सुल्तानपुर स्थित मंदिर से हजारों की संख्या में भक्तों द्वारा भगवान रघुनाथ का रथ निकाला जाता है.

इकट्ठे हुए देवता मुख्य देवता के साथ होते हैं. वे सभी त्योहार के समापन तक यहां ढालपुर मैदान में रहेंगे. इस बार त्योहार का समापन 14 अक्टूबर को होगा.

यह त्योहार यहां वर्ष 1637 से मनाया जा रहा है, उस समय कुल्लू में राजा जगत सिंह का शासन था.

उन्होंने कुल्लू में सभी स्थानीय देवताओं को दशहरे के दौरान भगवान रघुनाथ के सम्मान में एक अनुष्ठान करने के लिए आमंत्रित किया था. तबसे सैकड़ों गांवों के मंदिरों से देवताओं की वार्षिक सभा एक परंपरा बन गई है.

रियासतों के खत्म होने के बाद अब प्रशासन की ओर से देवताओं को आमंत्रित किया जाता है. परंपरा के अनुसार भक्त अपने देवता की मूर्ति को एक सुंदर ढंग से सजाई गई पालकी
में लेकर आते हैं.

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