Kumbh Mela 2019: 15 जनवरी को मकर संक्राति के दिन कुंभ का पहला स्नान होगा. इस बार का कुंभ का आयोजन प्रयागराज में भव्य तरीके से किया जा रहा है. कुंभ आकर पवित्र त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं. साथ ही प्रयागराज में प्राचीन स्थलों का दर्शन करने से आपकी कुंभ यात्रा पूरी तरह सफल रहती है. ऐसे में अगर आप भी कुंभ आने का प्लान बना रहे हैं तो त्रिवेणी संगम से कुछ दूरी पर ‘अक्षयवट’ के दर्शन करने जरूर जाइएगाा.

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‘अक्षयवट’ के बारे में जानें
पुराणों में वर्णन आता है कि कल्पांत या प्रलय में जब समस्त पृथ्वी जल में डूब जाती है उस समय भी वट का एक वृक्ष बच जाता है. अक्षय वट कहलाने वाले इस वृक्ष के एक पत्ते पर ईश्वर बालरूप में विद्यमान रहकर सृष्टि के अनादि रहस्य का अवलोकन करते हैं. अक्षय वट के संदर्भ कालिदास के रघुवंश और चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के यात्रा विवरणों में मिलते हैं. पूरे देश में चार पौराणिक पवित्र वटवृक्ष हैं— गृद्धवट- सोरों ‘शूकरक्षेत्र’, अक्षयवट- प्रयाग, सिद्धवट- उज्जैन और वंशीवट- वृन्दावन. अक्षय वट प्रयाग में त्रिवेणी के तट पर आज भी अवस्थित कहा जाता है. हिन्दुओं के अलावा जैन और बौद्ध भी इसे पवित्र मानते हैं. कहा जाता है बुद्ध ने कैलाश पर्वत के निकट प्रयाग के अक्षय वट का एक बीज बोया था. जैनों का मानना है कि उनके तीर्थंकर ऋषभदेव ने अक्षय वट के नीचे तपस्या की थी. प्रयाग में इस स्थान को ऋषभदेव तपस्थली (या तपोवन) के नाम से जाना जाता है.

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यह है मान्यता
चीनी यात्री ह्वेनसांग प्रयागराज के संगम तट पर आया था. उसने अक्षयवट के बारे में लिखा है- नगर में एक देव मंदिर (पातालपुरी मंदिर) है. यह अपनी सजावट और विलक्षण चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है. कहा जाता है कि जो श्रद्धालु इस स्थान पर एक पैसा चढ़ाता है, उसे एक हजार स्वर्ण मुद्रा चढ़ाने का फल मिलता है. मंदिर के आंगन में एक विशाल वृक्ष (अक्षयवट) है, जिसकी शाखाएं और पत्तियां दूर-दूर तक फैली हैं.

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मुगल शासकों ने कर दिया था प्रतिबंधित
पौराणिक और ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार मुक्ति की इच्छा से श्रद्धालु इस बरगद की ऊंची डालों पर चढ़कर कूद जाते थे. मुगल शासकों ने यह प्रथा खत्म कर दी. उन्होंने अक्षयवट को भी आम तीर्थयात्रियों के लिए प्रतिबंधित कर दिया. इस वृक्ष को कालान्तर में नुकसान पहुंचाने का विवरण भी मिलता है. आज का अक्षयवट पातालपुरी मंदिर में स्थित है. यहां एक विशाल तहखाने में अनेक देवताओं के साथ बरगद की शाखा रखी हुई है. इसे तीर्थयात्री अक्षयवट के रूप में पूजते हैं.

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रामायण में मिलता है उल्लेख
अक्षयवट का पहला उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है. भारद्वाज ऋषि ने भगवान राम से कहा था- नर श्रेष्ठ तुम दोनों भाई गंगा और यमुना के संगम पर जाना, वहां से पार उतरने के लिए उपयोगी घाट में अच्छी तरह देखभाल कर यमुना के पार उतर जाना. आगे बढ़ने पर तुम्हें बहुत बड़ा वट वृक्ष मिलेगा. उसके पत्ते हरे रंग के हैं. वह चारों ओर से दूसरे वृक्षों से घिरा हुआ है. उसका नाम श्यामवट है. उसकी छाया में बहुत से सिद्ध पुरुष निवास करते हैं. वहां पहुंचकर सीता को उस वृक्ष से आशीर्वाद की याचना करनी चाहिए. यात्री की इच्छा हो तो यहां कुछ देर तक रुके या वहां से आगे चला जाए.

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