Kumbh Mela 2019: प्रयागराज कुंभ का आगाज 15 जनवरी से होने जा रहा है. कुंभ मेला दुनिया भर में होने वाले धार्मिक आयोजनों में सबसे बड़ा है, जहां पर इतनी बड़ी संख्‍या में श्रद्धालु आते हैं. कुंभ का पर्व हर 12 वर्ष के अंतराल पर चारों में से किसी एक पवित्र नदी के तट पर मनाया जाता है- हरिद्वार में गंगा, उज्जैन में शिप्रा, नासिक में गोदावरी और इलाहाबाद में त्रिवेणी संगम जहां गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती हैं.

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ज्योतिष के मुताबिक, जब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, तब कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है. प्रयाग का कुंभ मेला सभी मेलों में सर्वाधिक महत्व रखता है. कुंभ का अर्थ है- कलश, ज्योतिष शास्त्र में कुम्भ राशि का भी यही चिह्न है. कुंभ मेले की पौराणिक मान्यता अमृत मंथन से जुड़ी हुई है. ऐसा कहा जाता है कि देवताओं एवं राक्षसों ने समुद्र के मंथन और उसके द्वारा प्रकट होने वाले सभी रत्नों को आपस में बांटने का निर्णय किया. समुद्र के मंथन द्वारा जो सबसे मूल्यवान रत्न निकला वह था अमृत, उसे पाने के लिए देवताओं और राक्षसों के बीच संघर्ष हुआ.

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असुरों से अमृत को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने वह पात्र अपने वाहन गरुड़ को दे दिया. असुरों ने जब गरुड़ से वह पात्र छीनने का प्रयास किया तो उस पात्र में से अमृत की कुछ बूंदें छलक कर इलाहाबाद, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन में गिरीं. तभी से प्रत्येक 12 वर्षों के अंतराल पर इन स्थानों पर कुंभा मेला आयोजित किया जाता है. 12 वर्ष के मान का देवताओं का बारह दिन होता है. इसीलिए 12वें वर्ष ही सामान्यतया प्रत्येक स्थान में कुंभ पर्व की स्थिति बनती है.

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कुंभ के ऐतिहासिक मायने
कुंभ मेले का आयोजन वैसे तो हजारों साल पहले से ही हो रहा है. इतिहासकार एसबी रॉय ने 10 हजार वर्ष ईसा पूर्व अनुष्‍ठानिक नदी स्‍नान को स्‍वसिद्ध किया है लेकिन मेले का प्रथम लिखित प्रमाण महान बौद्ध तीर्थयात्री हेवनेसांग के लेख में मिलता है, जिसमें छठवी शताब्‍दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासन में होने वाले कुंभ का प्रसंगवश वर्णन किया गया है. अंतरजाल पर कुंभ से संबंधित इतिहास 600 साल ईसा पूर्व बौद्ध लेखों में मिलता है.

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400 वर्ष ईसा पूर्व सम्राट चंद्रगुप्‍त के दरबार में यूनानी दूत ने एक मेले का वर्णन किया है. रॉय मानते हैं कि मेले का वर्तमान स्‍वरूप ने इसी काल में स्‍वरूप लिया था. कई पुराणों व प्रचानी मौखिक परंपराओं पर आधारित पाठों में धरती पर चार विभिन्‍न स्‍थानों पर अमृत गिरने का उल्लेख हुआ है. सर्व प्रथम आगम अखाड़े की स्थापना हुई, कालांतर में विखंडन होकर अन्य अखाड़े बने. 547 वर्ष ईसा पूर्व अभान नामक सबसे प्रारम्भिक अखाड़े का लिखित प्रतिवेदन इसी समय का है. जबकि 600 वर्ष ईसा पूर्व चीनी यात्री ह्यान-सेंग ने प्रयाग (वर्तमान इलाहाबाद) पर सम्राट हर्ष द्वारा आयोजित कुम्भ में स्नान करने का उल्‍लेख मिलता है.

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वर्ष 904 में निरंजनी अखाड़े के गठन के बाद 240 साल बाद सन 1146 में जूना अखाड़ा अस्तित्‍व में आया. फिर 1300 में राजस्‍थान सेना में कार्यरत कानफटा योगी साधु के उदय का उल्‍लेख मिलता है. 1398 में हरिद्वार कुंभ में तैमूर द्वारा हजारों श्रद्धालुओं का नरसंहार किया गया. इसका उल्‍लेख 1398 हरिद्वार महाकुंभ नरसंहार में विस्‍तार से उपलब्‍ध है.  1565 में मधुसूदन सरस्‍वती द्वारा दसनामी व्‍यवस्‍था की लडाका इकाईयों का गठन, जबकि 1675 में प्रणामी संप्रदाय के प्रवर्तक, महामति श्री प्राणनाथ जी विजयाभिनंद बुद्ध निष्‍कलंक घोषित किए गए.

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