नई दिल्ली. तीर्थराज प्रयाग में कुंभ मेले की शुरुआत हो चुकी है. करीब दो महीने तक चलने वाले दुनिया के सबसे बड़े आयोजनों में से एक इस उत्सव को लेकर देश-दुनिया से लाखों की तादाद में श्रद्धालु प्रयागराज पहुंच रहे हैं. प्रयागराज कुंभ का पहला शाही स्नान या पहला बड़ा कार्यक्रम संपन्न हो चुका है. अब आगामी 4 फरवरी को दूसरे शाही स्नान का आयोजन होगा. इसके अलावा अमावस्या और पूर्णिमा तिथियों पर किए जाने वाले स्नान को भी कुंभ में काफी महत्वपूर्ण माना गया है. अगर आप अभी तक इस अनोखे आयोजन को नहीं देख पाए हैं, तो चूकिए मत. हो आइए कुंभ. क्योंकि धरती पर होने वाले इस विशालतम आयोजन को करीब से देखने का मौका बिरले लोगों को ही मिल पाता है. गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के संगम पर स्थित त्रिवेणी में स्नान करने से जो पुण्य होता है, आध्यात्मिक दृष्टि से इसका महत्व विलक्षण है. लेकिन प्रयागराज कुंभ में जाने से पहले आपको कुंभ के आयोजन से जुड़ी कुछ बातों का जानना जरूरी है. क्योंकि कुंभ का महत्व जाने बिना, श्रद्धा और आस्था के इस अद्भुत जुटान को देखना अधूरा है. तो आइए पढ़ते हैं #Kumbh की कहानी.

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1. देश में 4 स्थानों पर ही क्यों होता है कुंभ

भारत में यूं तो धार्मिक आयोजन हर राज्य में होते हैं. लेकिन इन सबमें कुंभ अलग है. कुंभ की कहानी यह है कि यह देश में सिर्फ 4 स्थानों- तीर्थराज प्रयाग, नासिक, उज्जैन और हरिद्वार में ही होता है. सहज सा सवाल क्या इन 4 स्थानों का ताल्लुक कहीं चार धामों से तो नहीं है? तो इस सवाल का जवाब यह है कि चार धाम और 4 स्थानों पर कुंभ, यह दोनों धारणाएं बिल्कुल अलग-अलग है. देश में चार स्थानों पर कुंभ के आयोजन को समझने के लिए आपको पौराणिक साहित्य का सहारा लेना होगा, जहां समुद्र-मंथन के अध्याय का जिक्र है. डॉ. राजेंद्र त्रिपाठी ‘रसराज’ द्वारा लिखित ‘प्रयागराज कुंभ-कथा’ पुस्तक के मुताबिक, समुद्र मंथन से अमृत-कुंभ यानी अमृत से भरा हुआ घड़ा निकला. इस कुंभ को लेने के लिए देवताओं और असुरों के बीच छीना-झपटी होने लगी. अमृत-कुंभ की रक्षा में 4 देवताओं ने विशेष योगदान दिया. चंद्रदेव ने जहां इस कुंभ को गिरने से बचाया, वहीं सूर्य ने इसे फूटने से बचाया. बृहस्पति ने दैत्यों से रक्षा की तो शनि ने इंद्र के प्रकोप से सबको बचाया. इन चारों देवताओं के नाम से चार ग्रह भी हैं. इन्हीं 4 ग्रहों के योग से कुंभ-योग होता है. इसलिए देश में सिर्फ 4 स्थानों पर ही कुंभ का आयोजन किया जाता है. इसके बारे में संस्कृत में कहा गया है-

चंद्रः प्रस्रवणाद् रक्षां सूर्यो विस्फोटमाद्दधौ।
दैत्येभ्यश्च गुरू रक्षां सौरिदेवेंद्र जाद्भयात्।।

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2. 12 साल के बाद ही क्यों आता है कुंभ

तीर्थराज प्रयाग में अभी जो #Kumbh2019 चल रहा है, वह दरअसल अर्द्धकुंभ है. लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार के प्रयासों और श्रद्धालुओं की आस्था को देखते हुए इसे कुंभ जैसा ही भव्य और अलौकिक स्वरूप दिया गया है. बहरहाल, कुंभ का आयोजन जहां हर 12 साल के बाद किया जाता है, वहीं अर्द्धकुंभ इसके बीच में यानी 6 साल बाद होता है. कुंभ का आयोजन 12 साल बाद करने के पीछे भी धार्मिक कथा है. ‘प्रयागराज कुंभ-कथा’ के अनुसार, कहा जाता है कि देवताओं के 12 दिन के बराबर धरती पर 12 वर्ष होते हैं. यानी धरती पर एक दशक से ज्यादा की अवधि देवताओं के लिए महज दिनों में गिन ली जाती है. कुंभ-पर्व का आयोजन माघ महीने में ही होता है. प्रयागराज स्थित त्रिवेणी संगम में माघ-स्नान को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी माना गया है. तीर्थराज क्षेत्र में माघ महीने में संगम स्नान करने वाले को समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है. प्रयाग में कुंभ कब और कैसे पड़ता है, इस बारे में भी विस्तृत उल्लेख किया गया है. सूर्य जब मकर राशि के हों और बृहस्पति वृष राशि पर, तब प्रयाग में अति दुर्लभ कुंभ का योग होता है. माघ का महीना हो, अमावस्या तिथि हो, बृहस्पति वृष राशि पर हो और सूर्य, चंद्रमा मकर राशि पर तब तीर्थराज प्रयाग में अत्यंत दुर्लभ कुंभ का योग होता है-

मकरे च दिवानाथे वृषगे च वृहस्पतौ।
कुंभयोगो भवेत तत्र प्रयागे ह्यति दुर्लभः।।
माघे वृषगते जीवे मकरे चंद्रभास्करौ।
अमावस्यां यदा योगः कुंभाख्यस्तीर्थ नायके।।

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3. प्रयाग में माघ-स्नान से कई लाभ

तीर्थों में सबसे बड़ा यानी तीर्थराज प्रयाग में कुंभ के दौरान स्नान का तो धार्मिक महत्व है ही, ऐसे भी प्रयाग जाकर माघ के महीने में त्रिवेणी संगम में स्नान करना काफी फलदायी माना जाता है. कहा गया है कि माघ के महीने में तीर्थराज प्रयाग में माघ के महीने में समस्त तीर्थ, देव-जातियां और ऋषि पहुंचते हैं. इस महीने में प्रयाग आना देवताओं के लिए भी दुर्लभ योग है. यानी देवताओं के लिए भी प्रयाग में माघ के महीने में संगम स्नान करना पुण्य देने वाला काम है. पौराणिक शास्त्रों में कहा गया है कि माघ के महीने में प्रयागराज में स्नान करने का सौभाग्य ऋषि-मुनियों यानी पुण्यात्माओं को ही मिल पाता है. इस काल में संगम स्नान करने से लोगों को मोक्ष की प्राप्ति होती है, यानी माघ के महीने में अगर आप तीर्थराज प्रयाग जाकर संगम में डुबकी लगाएं तो आप पुनर्जन्म के झंझट से छुटकारा मिल जाएगा. इस समय संगम स्नान करने वालों को सीधे बैकुंठ की प्राप्ति होती है. कहा भी गया है-

स्नाताश्च ये मकरभास्करोदये तीर्थे प्रयागे सुरसिंधु संगमे।
तेषां गृहद्वारमलंकरोति किं भृंगावलिः कंजरकर्णताडिता।।
यो राजसूयाद्धयेमेधयज्ञतः स्नानात्फलं संप्रददाति चाधिकम्।
पापानि सर्वाणि विलोप्य लीलया नूनं प्रयागः स कथं न सेव्यते।।