Kumbh Mela 2019: प्रयागराज में कुंभ 2019 का आगाज हो चुका है. कुंभ मेले का दूसरा शाही स्नान 21 जनवरी को पौष पूर्णिमा के दिन होगा. इसी दिन लाखों श्रद्धालु स्नान दान के साथ कल्पवास भी शुरू करेंगे. कल्पवास पौष महीने के 11वें दिन से शुरू होकर माघ महीने के 12वें दिन तक रहता है. इस पूरे एक माह तक जप, तप, और अनुशासित जीवन शैली से कल्पवासियों को न केवल आध्यात्मिक बल्कि सामाजिक, मानसिक और शारीरिक लाभ भी मिलता है. जीवन-मृत्यु के बंधनों से मुक्ति की कामना लेकर कुंभ में आने वाले कल्पवासी यहां से तमाम अलौकिक शक्ति बटोरकर ले जाएंगे.

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क्‍या है कल्‍पवास
कुंभ मेले के दौरान संगम तट पर कल्पवास का विशेष महत्व है. पद्म पुराण एवं ब्रह्म पुराण के अनुसार कल्पवास की अवधि पौष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी से प्रारंभ होकर माघ मास की एकादशी तक है.

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पद्म पुराण में महत्‍व
पद्म पुराण में महर्षि दत्तात्रेय ने कल्पवास की पूर्ण व्यवस्था का वर्णन किया है. उनके अनुसार कल्पवासी को इक्कीस नियमों का पालन करना चाहिए.

ये नियम हैं
सत्यवचन, अहिंसा, इन्द्रियों का शमन, सभी प्राणियों पर दयाभाव, ब्रह्मचर्य का पालन, व्यसनों का त्याग, सूर्योदय से पूर्व शैय्या-त्याग, नित्य तीन बार सुरसरि-स्न्नान, त्रिकालसंध्या, पितरों का पिण्डदान, यथा-शक्ति दान, अन्तर्मुखी जप, सत्संग, क्षेत्र संन्यास अर्थात संकल्पित क्षेत्र के बाहर न जाना, परनिन्दा त्याग, साधु सन्यासियों की सेवा, जप एवं संकीर्तन, एक समय भोजन, भूमि शयन, अग्नि सेवन न कराना. जिनमें से ब्रह्मचर्य, व्रत एवं उपवास, देव पूजन, सत्संग, दान का विशेष महत्व है.

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कब है अगला शाही स्‍नान

पौष पूर्णिमा-21 जनवरी
भारतीय पंचांग के पौष मास के शुक्ल पक्ष की 15वीं तिथि को पौष पूर्णिमा कहते हैं. पूर्णिमा को ही पूर्ण चन्द्र निकलता है. कुंभ मेला की अनौपचारिक शुरूआत इसी दिवस से चिन्हित की जाती है. इसी दिवस से कल्पवास का आरम्भ भी होता है.

मौनी अमावस्या-4 फरवरी
यह व्यापक मान्यता है कि इस दिन ग्रहों की स्थिति पवित्र नदी में स्नान के लिए सर्वाधिक अनुकूल होती है. इसी दिन प्रथम तीर्थांकर ऋषभ देव ने अपनी लंबी तपस्या का मौन व्रत तोड़ा था और यहीं संगम के पवित्र जल में स्नान किया था. इस दिवस पर मेला क्षेत्र में सबसे अधिक भीड़ होती है.

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बसंत पंचमी-10 फरवरी
हिन्दू मिथकां के अनुसार विद्या की देवी सरस्वती के अवतरण का यह दिवस ऋतु परिवर्तन का संकेत भी है. कल्पवासी बसंत पंचमी के महत्व को चिन्हित करने के लिए पीत वस्त्र धारण करते हैं.

माघी पूर्णिमा-19 फरवरी
यह दिवस गुरू बृहस्पति की पूजा और इस विश्वास कि हिन्दू देवता गंधर्व स्वर्ग से पधारे हैं, से जुड़ा है. इस दिन पवित्र घाटो पर तीर्थयात्रियों की बाढ़ इस विश्वास के साथ आ जाती है कि वे सशरीर स्वर्ग की यात्रा कर सकेगें.

महाशिवरात्रि-4 मार्च
यह दिवस कल्पवासियों का अन्तिम स्नान पर्व है और सीधे भगवान शंकर से जुड़ा है. और माता पार्वती से इस पर्व के सीधे जुड़ाव के नाते कोई भी श्रद्धालु शिवरात्रि के व्रत ओर संगम स्नान से वंचित नहीं होना चाहता. कहते हैं कि देवलोक भी इस दिवस का इंतजार करता है.

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