Kurma Dwadashi: पौष मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को ‘कूर्म द्वादशी’ के नाम से जाना जाता है, जो कि इस बार 18 जनवरी को है. कूर्म द्वादशी भगवान् विष्णु के ‘कूर्म’ अथवा ‘कच्छप’ अवतार को समर्पित है. ऐसी मान्‍यता है कि इस दिन श्रद्धा के साथ विधि-विधान से व्रत करने वाले मनुष्य को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और साथ ही मोक्ष की प्राप्ति भी होती है. बता दें कि आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम ज़िले में स्थित ‘श्री कूर्ममकूर्मनाथ स्वामी मंदिर’ भगवान् विष्णु के कूर्म अवतार को समर्पित प्रमुख मंदिरों में से एक है. दूर-दूर से भारी संख्या में भक्तजन यहां भगवान् कूर्म के दर्शन करने आते हैं.

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कूर्म द्वादशी व्रत व पूजन विधि
कूर्म द्वादशी व्रत के नियमों का प्रारम्भ दशमी तिथि से ही हो जाता है. सर्वप्रथम व्रतधारी को दशमी के दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए और उसके पश्चात् पूरे दिन सात्विक आचरण का पालन करना चाहिए. उसके उपरान्त एकादशी को प्रातः स्नान-ध्यान कर पूरे दिन अन्न-जल ग्रहण किये बिना ही व्रत रखना चाहिए. यदि ऐसा करना संभव न हो, तो इस व्रत में जल और फल ग्रहण कर सकते हैं. अगले दिन अर्थात् कूर्म द्वादशी के दिन भगवान् कूर्म का पूजन करने के पश्चात् प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण करें. इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अनुष्ठान और अभिषेक आदि का आयोजन किया जाता है. भक्तजन मंदिर जाकर भगवान् विष्णु और उनके कूर्म अवतार के दर्शन करते हैं और श्लोकों एवं मन्त्रों का जाप करते हुए भगवान् कूर्म की आराधना करते हैं.

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कूर्म द्वादशी का महत्‍व
ऐसा माना जाता है कि कूर्म द्वादशी का व्रत पूरी निष्ठा और सच्चे मन से करने वाले मनुष्य के सभी पाप दूर हो जाते हैं और उसे समस्त अपराधों के दंड से भी मुक्ति मिल जाती है. साथ ही कूर्म द्वादशी के व्रत से अर्जित होने वाले पुण्य के फलस्वरूप मनुष्य संसार के समस्त सुख भोगकर अंत में मोक्ष प्राप्त करता है.

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जानिए कूर्म अवतार की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, देवराज इंद्र ने एक बार अपनी शक्ति और ऐश्वर्य के अहंकारवश ऋषि दुर्वासा द्वारा दी गई बहुमूल्य माला का निरादर कर दिया. इस बात से कुपित हो ऋषि दुर्वासा ने उन्हें शाप दे दिया, जिसके कारण देवताओं ने अपना बल, तेज, और ऐश्वर्य सब कुछ खो दिया और अत्यंत निर्बल हो गए. ऐसे में असुरों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया और उन्हें हराकर दैत्यराज बलि ने स्वर्ग पर कब्‍जा जमा लिया. तीनों लोकों में राजा बलि का राज स्थापित हो गया. इसके बाद सभी देवता भगवान् विष्णु के पास जाते हैं और उनसे मदद मांगते हैं. इसके बाद भगवान् विष्णु ने उन्हें समुद्र-मंथन कर अमृत प्राप्त करने और उसका पान कर पुनः अपनी खोई शक्तियाँ अर्जित करने का सुझाव दिया. किन्तु, यह कार्य इतना सरल नहीं था. देवता अत्यंत निर्बल हो चुके थे, अतः समुद्र-मंथन करना उनके सामर्थ्य की बात नहीं थी. इस समस्या का समाधान भी भगवान् विष्णु ने ही बताया. उन्होंने देवताओं से कहा कि वे जाकर असुरों को अमृत एवं उससे प्राप्त होने वाले अमरत्व के विषय में बताएं और उन्हें समुद्र-मंथन करने के लिए मना लें. इसक बाद दोनों पक्ष मिलकर समुद्र मंथन करें और उससे प्राप्त होने वाली मूल्यवान निधियों को आपस में बांट लें.

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जब देवताओं ने यह बात असुरों को बताई तो पहले तो उन्होंने मना कर दिया और सोचने लगे कि यदि हम स्वयं ही समुद्र मंथन कर लें तो सब कुछ हमें प्राप्त होगा. किन्तु अकेले ही समुद्र का मंथन कर पाने का सामर्थ्य तो असुरों के भी पास नहीं था. अंततः अमृत के लालच में वे देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने को सहमत हो गए. दोनों पक्ष क्षीर सागर पर आ पहुंचे, मंद्राचल पर्वत को मंथनी, वासुकि नाग को रस्सी (मंथने के लिए) के स्थान पर प्रयोग कर समुद्र मंथन प्रारम्भ हो गया. एक ओर देवता थे और दूसरी ओर असुर. किन्तु यह क्या! कोई ठोस धरातल न होने के कारण, मंथन प्रारम्भ होने के थोड़े ही समय पश्चात् मंद्राचल पर्वत समुद्र में धंसने लगा.

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समुद्र मंथन रोकना पड़ा, सब विचार करने लगे कि इस समस्या का क्या समाधान निकाला जाए. तब भगवान् विष्णु ने कूर्म (कच्छप या कछुआ) अवतार धारण किया और मंद्राचल पर्वत के नीचे आसीन हो गए. उसके पश्चात् उनकी पीठ पर मंद्राचल पर्वत स्थापित हुआ और समुद्र मंथन आरम्भ हुआ. भगवान् विष्णु के कूर्म अवतार के कारण ही समुद्र मंथन संभव हो पाया, जिसके फलस्वरूप समुद्र से अनेक बहुमूल्य रत्नों और निधियों, जीव-जंतुओं, देवी-देवताओं की उत्पत्ति हुई और अंततः देवताओं को अमृत की प्राप्ति हुई.

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