नई दिल्ली: मकर संक्रांति एक ऐसा कृषि पर्व है, जो पूरे देश में अलग-अगल तरह से मनाया जाता है. हिंदी महीना पौष में मनाए जाने वाले इस पर्व पर बिहार के मिथिलांचल में खिचड़ी खाने की परंपरा है. मिथिला में इस अवसर पर खिचड़ी जीमने (ज्योनार) की परंपरा सदियों से चली आ रही है. मकर संक्रांति सर्दी के मौसम में मनाई जाती है, इसलिए इस अवसर पर देवताओं को तिल और गुड़ से बने लड्ड का प्रसाद चढ़ाया जाता है. यही कारण है कि मिथिलांचल के लोग इसे ‘तिला संक्रांति’ भी कहते हैं.

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संक्रांति से तात्पर्य संक्रमण काल से है. दरअसल, यह पर्व सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश के अवसर पर मनाया जाता है. इसलिए इसे मकर संक्रांति कहते हैं. मिथिलांचल से आने वाले लेखक व शिक्षाविद् डॉ. बीरबल झा बताते हैं कि यूं तो सर्दियों में खीर (दूध-चावल से बना व्यंजन) को उत्तम भोजन माना जाता है, मगर कदाचित गरीबों के लिए दूध जुटाना संभव नहीं था, इसलिए पानी में पकने वाली खिचड़ी बनाने की परंपरा शुरू हुई होगी. संस्कृत भाषा में एक कहावत है- अमृतं शिशिरे वह्न्रिमृंत क्षीरभोजनम् अर्थात् सर्दी के मौसम में आग और क्षीर (खीर) का भोजन अमृत के समान होता है. डॉ. झा ने कहा कि गरीब-अमीर के बीच बिना किसी भेदभाव के मकर संक्रांति के अवसर पर मिथिला में ज्योनार के रूप में खिचड़ी पकाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है.

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दही-चूड़ा तिलबा (तिल का लड्ड) खाते हैं लोग
उन्होंने कहा कि यह प्रकृति की अराधना का पर्व है जो सूर्य के उत्तरायण होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है. यही कारण है कि कड़ाके की ठंड में लोग सूर्योदय से पूर्व स्नान करके सूर्य को अघ्र्य देते हैं और तिलाठी (तिल के पौधे का ठंडल) जलाकर खुद को गर्म करते हैं और पहले दही-चूड़ा तिलबा (तिल का लड्ड) खाते हैं.

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गोष्‍ठी में होगी ‘खिचड़ी पर चर्चा’
डॉ. झा ने बताया कि मिथिला की संस्कृति के संवर्धन के लिए कार्य कर रही दिल्ली की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘मिथिलालोक फाउंडेशन’ ने मंकर संक्रांति के अवसर पर इस साल 15 जनवरी को ‘खिचड़ी दिवस’ मनाने का निर्णय लिया है. डॉ. बीरबल झा इस संस्था के संस्थापक अध्यक्ष हैं. उन्होंने कहा कि इस मौके पर एक गोष्ठी का भी आयोजन किया जाएगा, जिसका विषय ‘खिचड़ी पर चर्चा’ रखा गया है. कार्यक्रम का समय संध्या 5 से 7 बजे तक रखा गया है.

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