Muharram 2019: इस्लामिक नया साल मुहर्रम माह की पहली तारीख से शुरू हो चुका है, लेकिन इसके बाद भी मुस्लिम जश्न नहीं मनाते. मुहर्रम की दसवीं तारीख दुनिया भर के मुस्लिमों के लिए गम लेकर आती है. मुहर्रम (हिजरी) का महीना इस्लामी इतिहास के ऐसे हिस्से की याद ताजा कर देता है, जो पूरी दुनिया के मुसलमानों के लिए मातम की वजह होता है. आज मुहर्रम की दसवीं तारीख है. यही वो महीना और दिन है जब इस्लाम के प्रवर्तक पैगंबर मोहम्मद के नाती हजरत हुसैन अपने परिवार और 72 साथियों के कर्बला की जंग में शहीद हो गए थे. ये एक ऐसी जंग थी, जिसमें यजीद की हजारों की सेना के सामने हारना तय तो था, लेकिन इसके बाद भी हजरत इमाम हुसैन ने घुटने नहीं टेके. और वह इस्लाम, अच्छाई व इंसानियत के लिए शहीद हो गए.

अच्छाई और इस्लाम के लिए बुराई के आगे नहीं झुके हसन-हुसैन
इमाम हुसैन की पैदाइश 626 में मदीना की है. वह अली इब्ने तालिब व फ़ातिमा ज़हरा के दूसरे बेटे थे. पहले बेटे हसन थे. दोनों ही इस्लाम के प्रवर्तक पैगंबर मुहम्मद को बेहद प्यारे थे. पिता अली इब्न के बाद उनके पहले बेटे हसन का खलीफा बनना तय था, लेकिन हसन को जहर देकर शहीद कर दिया गया. खलीफा मुआविया की मौत के हुकूमत उनके बेटे यजीद को मिल गई. यजीद बड़ा जालिम था. यजीद ने हुकूमत मिलते ही इमाम हुसैन को अधीनता स्वीकार करने को कहा, लेकिन हुसैन ने इनकार कर दिया. यजीद अल्लाह को नहीं मानता था. वह खुद को खुदा समझता था. यजीद चाहता था कि अगर हुसैन उसके अधीन आए तो इस्लाम उसके अधीन हो जाएगा.

Muharram 2019: इन WatsApp मैसेज के साथ करें इमाम हुसैन की शहादत को याद…

मदीने के बाद मक्का भी छोड़ा, 72 लोग थे साथ
वाकया सन 680 (61 हिजरी) का है. इराक में यजीद नाम इस खलीफा (बादशाह) ने हुसैन को यातनाएं देना शुरू कर दिया. तंग आकर हुसैन ने मदीना छोड़ने का इरादा किया. वह हज के लिए मक्का पहुंचे. यहां उन्हें पता चला कि यजीद के लोग उनका क़त्ल कर सकते हैं. वह मक्का को खून खराबा से नापाक नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने मक्का छोड़ दिया. उनके साथ परिवार, बच्चे, बूढ़े बुजुर्ग सहित कुल 72 लोग थे. वह कूफे शहर की ओर बढ़ रहे थे, तभी यजीद की सेना ने उन्हें बंदी बना लिया. और कर्बला (इराक का प्रमुख शहर) ले गई. कर्बला में भी यजीद ने दबाव बनाया कि उसकी बात मान लें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके बाद यजीद ने कर्बला के मैदान के पास बहती नहर से सातवें मुहर्रम को पानी लेने पर रोक लगा दी.

कर्बला में यजीद की सेना ने पानी पर भी लगाया पहरा
हुसैन के काफिले में 6 माह तक के बच्चे भी थे. अधिकतर महिलाएं थीं. पानी नहीं मिलने से ये लोग प्यास से तड़पने लगे. इमाम हुसैन ने यजीद की सेना से पानी मांगा, लेकिन यजीद की सेना ने शर्त मानने की बात कही. यजीद को लगा कि हुसैन और उनके साथ परिवार, बच्चे व महिलाएं टूट जाएंगे और उसकी शरण में आ जाएंगे, लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ. 9वें मुहर्रम की रात हुसैन ने परिवार व अन्य लोगों को जाने की इजाजत दी. और रात में रौशनी बुझा दी, लेकिन उन्होंने कुछ देर बाद रौशनी की तो सभी वहीँ मौजूद थे और सभी ने हुसैन का साथ देने का इरादा कर लिया. इसी रात की सुबह यानी 10वें मुहर्रम को यजीद की सेना ने हमला शुरू कर दिया. 10 अक्टूबर, 680 ( इस्लामी 61 हिजरी) को सुबह इमाम और उनके सभी साथी नमाज पढ़ रहे थे, तभी यजीद की सेना ने घेर लिया. इमाम व उनके साथी नमाज पढ़ते रहे.

नमाज़ पढ़ते वक़्त घेरा, पानी मांगने पर तीर बरसाकर किया शहीद
इसके बाद हुसैन व उनके साथियों पर शाम तक हमला कर सभी को ख़त्म कर दिया. इतिहास के अनुसार, यजीद ने हुसैन के छह माह और 18 माह के बेटे को भी मारने का हुक्म दिया. इसके बाद बच्चों पर तीरों की बारिश कर दी गई. इमाम हुसैन पर भी तलवार से वार किए गए. इस तरह से हजारों यजीदी सिपाहियों ने मिलकर इमाम हुसैन सहित 72 लोगों को शहीद कर दिया. इस घटना के बाद से ही मुसलमानों ने इस्लामी कलेंडर के नए साल में ख़ुशी मनाना छोड़ दिया. करीब 1400 साल बीतने के बाद मुस्लिम इस माह में ख़ुशी का जैसे शादी जैसे कार्यक्रम नहीं करते हैं.