नई दिल्‍ली: फाल्‍गुन मास की शुक्‍ल पक्ष द्वादशी को श्री नृसिंह द्वादशी के रूप में मनाया जाता है. इस साल यह 18 मार्च 2019 को पड़ रही है. ऐसी मान्‍यता है कि इस दिन विष्‍णु अवतार भगवान नरसिंह का उद्गम एक खंभे को चीर कर हुआ था. भगवान विष्णु के बारह अवतार में से एक अवतार भगवान नरसिंह का है. नृसिंह अवतार में भगवन श्री हरि विष्णु जी आधा मनुष्य और आधा शेर का रूप धारण करके दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया.

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पौराणिक कथा
विष्णु पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार दैत्यों के आदिपुरुष कश्यप और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र हुए. हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष. हिरण्यकशिपु ने कठिन तपस्या द्वारा ब्रह्मा को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि न वह किसी मनुष्य द्वारा मारा जा सकेगा न पशु द्वारा, न दिन में मारा जा सकेगा न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार से उसक प्राणों को कोई डर रहेगा. इस वरदान ने उसे अहंकारी बना दिया और वह अपने को अमर समझने लगा. उसने इंद्र का राज्य छीन लिया और तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा. वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें. उसने अपने राज्य में विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया.

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हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद, भगवान विष्णु का उपासक था और यातना एवं प्रताड़ना के बावजूद वह विष्णु की पूजा करता रहा. क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में चली जाय क्योंकि होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी. जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो प्रह्लाद का बाल भी बाँका न हुआ पर होलिका जलकर राख हो गई.

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अंतिम प्रयास में हिरण्यकशिपु ने लोहे के एक खंभे को गर्म कर लाल कर दिया तथा प्रह्लाद को उसे गले लगाने को कहा. एक बार फिर भगवान विष्णु प्रह्लाद को उबारने आए. वे खंभे से नरसिंह के रूप में प्रकट हुए तथा हिरण्यकशिपु को महल के प्रवेशद्वार की चौखट पर, जो न घर का बाहर था न भीतर, गोधूलि बेला में, जब न दिन था न रात, आधा मनुष्य, आधा पशु जो न नर था न पशु ऐसे नरसिंह के रूप में अपने लंबे तेज़ नाखूनों से जो न अस्त्र थे न शस्त्र, मार डाला. इस प्रकार हिरण्यकश्यप अनेक वरदानों के बावजूद अपने दुष्कर्मों के कारण भयानक अंत को प्राप्त हुआ

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नृसिंह द्वादशी पूजन विधि
नृसिंह द्वादशी के दिन व्रत-उपवास एवम पूजा-अर्चना की जाती है. नृसिंह जयंती के दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहर्त में उठकर स्नान आदिसे निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए एवम भगवान नृसिंह की पूजा विधि-विधान से करे. भगवान नृसिंह की पूजा फल, फूल, धुप, दीप, अगरबत्ती, पंचमेवा, कुमकुम, केसर, नारियल, अक्षत एवम पीतांबर से करे. भगवान नृसिंह को प्रसन्न करने हेतु निम्न मन्त्र का जाप करे

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्.
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम्.

इन मंत्रो के जाप करने से समस्त प्रकार के दुखो का निवारण होता है तथा भगवान नृसिंह की कृपा से जीवन में मंगल ही मंगल होता है. भगवान नृसिंह अपने भक्तो की सदैव रक्षा करते है. तो प्रेम से बोलिए भगवान विष्णु रूप नृसिंह देव की जय.

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