Pitru Paksha 2018 Pind Daan: इस साल पितृपक्ष सोमवार, 24 सितंबर 2018 से शुरू हो रहा है. 24 सितंबर से शुरू होने वाला पितृपक्ष 8 अक्टूबर 2018 सोमवार सर्वपितृ अमावस्या यानी महालय अमावस्या के साथ खत्म हो जाएगा. महालय अमावस्या के दिन खासतौर से वह लोग जो अपने मृत पूर्वजों की तिथि नहीं जानते, वह इस दिन तर्पण करा सकते हैं. Also Read - बिहार के गया में 16 साल की किशोरी को मारकर चेहरा जलाया, पुलिस ने कहा- 'ऑनर किलिंग'

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ऐसी मान्यता है कि जो लोग पितृ पक्ष में पूर्वजों का तर्पण या पिंडदान नहीं कराते, उन्हें पितृदोष लगता है. इससे मुक्ति पाने का सबसे आसान उपाय पितरों का श्राद्ध कराना है. श्राद्ध करने के बाद ही पितृदोष से मुक्ति मिलती है. Also Read - Pitru paksha 2018: पितृपक्ष में सिर्फ माता-पिता नहीं, अंजाने पूर्वजों का भी कर सकते हैं श्राद्ध

Pitru Paksha 2018 Date: कब से शुरू हो रहा है पितृ पक्ष, क्या होगा श्राद्ध का सही समय, जानिये

क्यों जरूरी है पिंडदान:

इंसान जब तक जीता है कई रिश्ते-नाते उसके साथ चलते हैं, लेकिन मृत्यु पश्चात् खुद के सगे-संबंधी तक उन्हें अधिक दिनों तक याद नहीं रखते. इंसान भले ही इस संसार में अकेला आता है, लेकिन विषय और संसारिक मोह के बंधनों में बंधकर वह कई रिश्तों की कड़ी बन जाता है.

लेकिन मरने के बाद सिर्फ शरीर समाप्त होता है. उसकी आत्मा समाप्त नहीं होती. उसकी आत्मा का आगे का सफर तभी बढ़ता है, जब उसकी कर्मों का सारा हिसाब किताब हो जाता है.

आत्मा के इसी सफर को आसान बनाने के लिए हिन्दू धर्म में कर्मकांडों की व्यवस्था की गई है. जिसमें सबसे अहम श्राद्ध और पिंडदान को माना जाता है. अपने पित्रों को तर्पण और निमित अर्पण करना उनकी आत्मा की शांति के लिए सबसे जरूरी माना गया है.

क्या है पिंडदान:

अमावस्या या पितृपक्ष का समय अपने मृत पूर्वजों का श्राद्ध करने का सबसे उत्तम समय माना गया है. पिंड शब्द का शाब्दिक अर्थ किसी वस्तु का गोलाकार रूप होता है. प्रतिकात्मक रूप में शरीर को भी पिंड ही माना जाता है. पिंडदान के लिए पके हुए चावल, दूध और तिल को मिलाकर एक पिंड का रूप दिया जाता है. फिर उसे उन्हें अर्पित किया जाता है. पितृपक्ष के दौरान मृत व्यक्ति अपने पुत्र और पौत्र से पिंडदान की आशा रखते हैं.

भाद्रपद के कृष्णपक्ष के 15 दिन पितृपक्ष कहलाते हैं. पितृ ऋण से मुक्ति पाने का यह श्रेष्ठ समय होता है. शास्त्रों की यह मान्यता है कि पूर्वजों को याद किया जाने वाला पिंडदान उनतक सीधे पहुंचता है और उन्हें स्वर्गलोक लेकर जाता है.

जरूरी बातें

1. पिंडदान में दूध, शहद, तुलसी पत्ता, तिल आदि का महत्वपूर्ण होता है.

2. पिंडदान में सोना, चांदी, तांबे, कांसे या पत्तल के पात्र का ही प्रयोग करना चाहिए.

3. कुत्ता, कौआ और गायों को पितृपक्ष के दौरान भोजन जरूर कराएं. ऐसी मान्यता है कि कुत्ता और कौआ पित्रों के करीब होते हैं और गाएं उन्हें वैतरणी पार कराती हैं.

4. श्राद्ध के लिए गया, बद्रीनाथ, हरिद्वार, गंगासागर, पुश्कर, जगन्नाथपुरी, काशी, कुरुक्षेत्र, आदि को सबसे उत्तम स्थान माना जाता है.

5. पिंडदान के लिए यह जरूरी नहीं कि आप किसी श्रेष्ठ जगह ही जाएं या किसी बड़े पंडित को ही बुलाएं. सरल विधि के द्वारा आप घर पर भी श्राद्ध कार्य को कर सकते हैं.

कैसे करते हैं पिंडदान

1. सबसे पहले पिंडदान के समय मृतक के घरवाले जौ या चावल के आंटे में दूध और तिल मिलाकर गूथ लें और उसका गोला बना लें.

2. तर्पण करते समय पीतल की थाली या बर्तन में साफ जल भरकर उसमें थोड़े सा काला तिल व दूध डालकर अपने सामने रख लें और अपने सामने एक दूसरा खाली बर्तन रख लें.

3. दोनों हाथों को एकसाथ मिलाकर उस मृत व्यक्ति का नाम लेकर तृप्यन्ताम कहते हुये अंजली में भरे हुये जल को दूसरे खाली पात्र में छोड़ दें.

4. जल में काले तिल, जौ, कुशा एवं सफेद फूल मिलकार उस जल से विधिपूर्वक तर्पण किया जाता है, इससे पितर तृप्त होते हैं.

5. इसके बाद श्राद्ध के बाद ब्राह्मण को भोजन कराकर यथाशक्ति दान दिया जाता है.

हालांकि पितृपक्ष में कर्मकांड का विधि व विधान अलग-अलग है. श्रद्धालु एक दिन, तीन दिन, सात दिन, पंद्रह दिन और 17 दिन का कर्मकांड करते हैं.

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