गया. सनातन धर्म में विश्वास करने वाले आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष ‘पितृपक्ष‘ के प्रारंभ होने के बाद अपने पुरखों की आत्मा की शांति और उनके उद्धार (मोक्ष) के लिए लाखों लोग मोक्षस्थली गया में पिंडदान के लिए आते हैं. विश्व में पूर्वजों को मोक्ष प्रदान करने के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली इस मोक्षस्थली पर आने वाले लोग ऐसे तो कई वेदियों पर आकर पिंडदान करते हैं, मगर वे धर्मारण्य वेदी पर पिंडदान करना नहीं भूलते. मान्यता है कि इस वेदी पर पिंडदान के बाद ही पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा पितृदोष और प्रेतबाधा से मुक्ति मिलती है. आत्मा और प्रेतात्मा में विश्वास रखने वाले लोग आश्विन कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि से पूरे पितृपक्ष की समाप्ति तक गया में आकर पिंडदान करते हैं. मान्यता है कि कुरुक्षेत्र में कौरवों और पांडवों की लड़ाई के बाद महाराज युधिष्ठिर ने यहीं आकर पिंडदान कर अपने पितरों को मोक्ष की प्राप्ति कराई थी.

गया में पिंडदान का क्या है महत्व, 10 बिंदुओं में जानिए

इतिहास में मिले वर्णन के अनुसार, गया में पुराने समय में 365 वेदियां थीं, जहां लोग पिंडदान किया करते थे. मगर वर्तमान समय में 45 वेदियां हैं, जहां लोग पिंडदान कर तथा नौ स्थानों पर तर्पण कर अपने पुरखों का श्राद्ध करते हैं. इन्हीं 45 वेदियों में से एक वेदी धर्मारण्य वेदी भी है. गया शहर से करीब छह मिलोमीटर दूर बोधगया में अवस्थित धर्मारण्य वेदी की मान्यता है कि कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध के बाद स्वयं भगवान कृष्ण यहां पांडवों को लेकर आए थे और पितृयज्ञ करवाया था. हिंदू संस्कारों में पंचतीर्थ वेदी में धर्मारण्य वेदी की गणना की जाती है. गयावाल तीर्थवृत्ति सुधारिनी सभा के मंत्री और गयवाल पंडा मनीलाल बारीक ने बताया कि स्कंद पुराण के अनुसार, ‘महाभारत युद्ध के दौरान मारे गए लोगों की आत्मा की शांति और पश्चाताप के लिए धर्मराज युधिष्ठिर ने धर्मारण्य पिंडवेदी पर यज्ञ का आयोजन कर पिंडदान किया था. धर्मारण्य पिंडवेदी पर पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध का विशेष महत्व है. यहां किए गए पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध से प्रेतबाधा से मुक्ति मिलती है.’ उन्होंने बताया कि यहां त्रिपिंडी श्राद्ध का महत्व है, जिसके तहत यहां जौ, चावल और तिल, गुड़ से पिंड दिया जाता है.

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गयावाल तीर्थवृत्ति सुधारिनी सभा के अध्यक्ष पंडा गजाधर लाल कहते हैं कि धर्मारण्य वेदी पर पिंडदान के कर्मकांड को संपन्न कर पिंड सामग्री को अष्टकमल आकार के धर्मारण्य यज्ञकूप में श्रद्धालुओं द्वारा विसर्जित किया जाता है. कई पिंडदानी अरहट कूप में त्रिपिंडी श्राद्ध के पश्चात प्रेत बाधा से मुक्ति के लिए नारियल छोड़कर अपनी आस्था पूर्ण करते हैं. उन्होंने बताया कि धर्मारण्य वेदी पर पिंडदान करने से अकाल मृत्यु का भय, पितृदोष से मुक्ति तथा घर में प्रेतबाधा से भी शांति मिलती है. उन्होंने बताया कि पूर्वज जो मृत्यु के बाद प्रेतयोनि में प्रवेश कर जाते हैं तथा अपने ही घर में लोगों को तंग करने लगते हैं, उनका यहां पिंडदान हो जाने से उन्हें शांति मिल जाती है और वे मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं.

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धर्मशास्त्रों के अनुसार, धर्मराज युधिष्ठिर ने धर्मारण्य पिंडवेदी पर पिंडदान करने के बाद महाबोधि मंदिर स्थित धर्म नामक शिवलिंग और महाबोधि वृक्ष को नमन किया था. कालांतर से भगवान बुद्ध को भगवान विष्णु को अवतार मानकर सनातनी यहां भी पिंडदान करते हैं. मध्यप्रदेश से अपने पूर्वजों का पिंडदान करने आए रामस्वरूप भी कहते हैं कि गया में श्राद्ध की परंपरा काफी पुरानी है. इस धरती पर विष्णुपद मंदिर में जहां विष्णु के दर्शन होते हैं, वहीं अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाकर अपने पितृऋण से भी लोगों को मुक्ति मिल जाती है. इसके अलावे पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति भी हो जाती है. उल्लेखनीय है कि पितृपक्ष के मौके पर इन दिनों गया पिंडदानियों से पटा है. आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से पूरे पितृपक्ष की समाप्ति तक गया में आकर पिंडदान करते हैं. इस वर्ष 20 अक्टूबर को पितृपक्ष समाप्त हो रहा है.

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