नई दिल्ली. हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा सबसे बड़ी पूजा मानी जाती है. माता-पिता के जीवित रहते हुए और उनकी मृत्यु के बाद भी उन्हें याद किया जाता है. जन्मदाता को उनके पुत्र भुला न दें, इसके लिए ही हिन्दू धर्मग्रंथों में श्राद्ध करने की परंपरा है. यूं तो साल के किसी भी महीने में या जिस महीने माता-पिता की मृत्यु हुई होती है, उस महीने में श्राद्ध किया जाता है. लेकिन पितृपक्ष (Pitru Paksha) में यदि श्राद्ध किया जाए, तो उसकी मान्यता सबसे अधिक है. धर्मग्रंथों में माता-पिता के साथ-साथ अन्य पूर्वजों का श्राद्ध करने की परंपरा है. सभी पूर्वजों का श्राद्ध एक साथ कर सकें, इसके लिए जो समय निर्धारित है, उसे ही पितृपक्ष कहते हैं. भादो या भाद्रपद महीने की अमावस्या शुरू होते ही अगले 15 दिनों तक के समय को पितृपक्ष कहा जाता है. पितृपक्ष यानी पितरों के श्राद्ध का समय या पखवाड़ा. मान्यता है कि पितृपक्ष के 15 दिनों में पिंडदान करने से आपके पूर्वजों की आत्मा तृप्त होती है. यानी इन दिनों में आप दूध, चावल, शहद आदि मिलाकर जो पिंड बनाते हैं और उसे कौवे या गाय को खिलाकर पितरों को खिलाने का पुण्य कार्य करते हैं, इससे आपके अपनों (जिनकी मृत्यु हो चुकी है) की आत्मा को संतुष्टि मिलती है. लेकिन आप जो पिंड दान करते हैं, वह जाता कहां है, यह कभी आपने सोचा है. इस साल आगामी 24 सितंबर से पितृपक्ष शुरू हो रहा है. आइए जानते हैं कि श्राद्ध के दौरान किया जाने वाला पिंडदान आखिर हमारे पितरों तक पहुंचता कैसे है.

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जिसको जो योनि मिलेगी, उस रूप में प्राप्त होगा पिंडदान
यदि आप धार्मिक शास्त्रों और कर्मकांडों पर विश्वास करते हैं, तो पितृपक्ष में आपको अपने पितरों को अवश्य याद करना चाहिए. क्योंकि यही एक अवसर है जब आप अपने पूर्वजों को याद कर अपने जन्मदाताओं का स्मरण करते हैं. शास्त्रों के अनुसार, माता-पिता आदि के निमित्त उनके नाम और गोत्र का उच्चारण कर मंत्रों द्वारा जो अन्न आदि अर्पित किया जाता है, वह उनको प्राप्त हो जाता है. हिन्दू धर्म में मान्यता है कि व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका शरीर तो पृथ्वी पर ही रह जाता है, लेकिन आत्मा मनुष्य योनि को छोड़कर किसी दूसरी योनि को प्राप्त होती है या उसे मोक्ष मिल जाता है. मृत्यु के बाद इन आत्माओं को दूसरी योनि या स्वर्ग में भी शांति मिलती रहे, इसलिए पिंडदान किया जाता है. जगजीवन दास गुप्त लिखित पुस्तक ‘ज्योतिष रहस्य’ के मुताबिक, व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार मृत्यु के बाद योनि प्राप्त होती है. यदि अपने कर्मों के अनुसार आत्मा को देवयोनि प्राप्त होती है, तो उसके वंशजों द्वारा किया गया पिंडदान उसे अमृत रूप में प्राप्त होता है. इसी तरह गंधर्व लोक प्राप्त होने पर भोग्य रूप में, पशुयोनि में तृण (घास) रूप में, सर्प योनि में वायु रूप में, यक्ष योनि में पेय रूप में, दानव योनि में मांस के रूप में, प्रेत योनि में रुधिर रूप में और मनुष्य योनि में अन्न रूप में प्राप्त होता है.

Pitru Paksha 2018: 24 सितंबर से शुरू हो रहा है पितृपक्ष, कब, कैसे और कहां करें पिंडदान

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पितरों को संतुष्ट करना वंशजों का कर्तव्य है
पितृपक्ष के बारे में कहा जाता है कि श्राद्ध का समय शुरू होते ही पितर श्राद्ध स्थल पर आ जाते हैं. श्राद्ध के बाद जो पिंडदान किया जाता है, उस समय पितर वायु रूप में उनके वंशजों द्वारा दिया गया भोजन ग्रहण करते हैं. कहा गया है कि सूर्य जब कन्या राशि में आते हैं, तो यह पितरों के आने का काल है. इसी समय पितर अपने पुत्र या पौत्रों के यहां आते हैं. यह काल पितृपक्ष कहा जाता है. ज्योतिष रहस्य के अनुसार, इस समय अगर पितरों के लिए पिंडदान नहीं किया गया तो वे नाराज हो जाते हैं और अपने वंशजों को श्राप भी दे सकते हैं. खासकर पितृपक्ष की अमावस्या को पितर दरवाजे पर आकर बैठ जाते हैं. इस दिन अगर उनके वंशजों ने श्राद्ध नहीं किया तो वे पुत्र-पौत्रों को शाप देकर लौट जाते हैं. इसलिए हिन्दू धर्म में मान्यता है कि इस दिन पत्र, पुष्प, फल और जल-तर्पण से पितरों को संतुष्ट करना चाहिए. संस्कृत में कहा गया है- ‘कन्यागते सवितरि पितरो यान्ति वै सुतान। अमावस्या दिने प्राप्ते गृहद्वारं समाश्रिताः, श्राद्धाभावे स्वभवनं शापं दत्वा व्रजन्ति ते।।

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इन महीनों में भी कर सकते हैं पिंडदान
यूं तो पितृपक्ष के दिनों में पितरों के लिए पिंडदान करने को सबसे अच्छा माना गया है, लेकिन आप साल के दूसरे महीनों में भी निर्धारित तिथियों को पिंडदान कर सकते हैं. हिन्दू कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद के अलावा भी कई और महीने हैं, जिनमें पितरों की संतुष्टि के लिए किया गया तर्पण, पुण्यदायी होता है. विष्णु पुराण के अनुसार, माघ मास की अमावस्या के दिन यदि शतभिषा नक्षत्र का योग हो, तो यह संयोग पितरों की तृप्ति के लिए दुर्लभ, लेकिन सबसे पवित्र और उत्तम होता है. इसी दिन अगर घनिष्ठा नक्षत्र का योग हो जाए और ऐसे समय अगर कोई वंशज अपने पितर के लिए तर्पण करे, तो यह तर्पण पितरों को 10 हजार वर्षों तक तृप्त करने वाला होता है. भाद्र नक्षत्र के योग में किए गए तर्पण से पितर 1 हजार वर्ष तक तृप्त रहते हैं. इसी तरह किसी भी तिथि को यदि गंगा, शतद्रु, यमुना, पिपासा, सरस्वती, गोमती आदि नदियों में स्नान कर पितरों के लिए तर्पण किया जाए तो इससे भी पितरों को सुख और आनंद की प्राप्ति होती है. पितरों को सबसे अधिक तृप्ति तब होती है, जब उन्हें लगे कि उनके लिए किया गया तर्पण लोभमुक्त होकर किया गया है. अगर कोई वंशज पितरों से पुण्य लाभ प्राप्ति का लोभ कर तर्पण करता है तो पितरों को प्रसन्नता नहीं होती है. बल्कि पितर चाहते हैं कि उनके वंशज धन से या लोभ से मुक्त होकर पिंडदान करें.

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