नई दिल्ली. हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के 15 दिनों में लोग अपने पितरों का श्राद्ध करते हैं. लेकिन विभिन्न शास्त्रों के मतानुसार, किसी व्यक्ति को सिर्फ अपने माता-पिता के निमित्त ही श्राद्ध नहीं करना चाहिए. बल्कि पितृ-कुल के साथ-साथ मातृ-कुल के पितरों का श्राद्ध भी करना चाहिए. इसके अलावा अज्ञात कुल के पितरों का श्राद्ध करने की भी परंपरा कही गई है. इसलिए अगर पितृपक्ष में आप अपने पितरों का श्राद्ध करते हैं, तो शास्त्रों में श्राद्ध के लिए दिए गए निर्देशों का पालन अवश्य करें. मैथिली के प्रसिद्ध कवि और संस्कृत के ज्ञाता विद्यापति ने भी गया में पितरों के श्राद्ध के संबंध में पिंडदान को लेकर अपना मत रखा है. धर्मशास्त्र विषय में शोध करने वाले डॉ. संतोष कुमार मिश्र के अनुसार, गया में वैसे तो लोग अपने माता-पिता का श्राद्ध करने के लिए पहुंचते हैं, लेकिन जो लोग अनाम यानी अज्ञात कुल के लोगों के निमित्त भी पिंडदान करना चाहते हैं, वे भी गया जाकर श्राद्ध कर सकते हैं.

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डॉ. संतोष कुमार मिश्र ने बताया कि अज्ञातगतिक मातामह कुल के मरे हुए, श्वसुर कुल के मरे हुए, पितृकुल के मरे हुए, अज्ञात नामक मृत पुरुषों के निमित्त भी हिन्दू धर्म में श्राद्ध करने की परंपरा रही है. यही नहीं, गर्भ में ही मर जाने वाले, नाम गोत्र विवर्जित बन्धुवर्ग, फांसी पर लटक कर मर जाने वाले, विष तथा शस्त्र के द्वारा मरे हुए, अग्निदाह में मरे हुए स्वजनों के लिए भी पिंडदान का विधान कहा गया है. इसके अलावा सिंह, बाघ आदि हिंसक जानवरों के द्वारा मारे गए, दांत तथा सिंह वाले जानवरों के द्वारा मारे गए, असिपत्रवन, कुम्भीपाकादि अनेक यातनाप्रद नरकों में स्थित प्रेतलोक में गए हुए पितरों के निमित्त भी श्राद्ध किया जा सकता है. वहीं, पशु-पक्षी-कीट और सरीसृप (सर्प आदि) वृक्षादि योनि में जन्म लेने वाले, हजारों जातियों की योनि के अन्तर्गत भ्रमणशील पितरों का आवाहन कर उनके उद्धार के लिए पिंड देने का विधान है.

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विद्यापति के अनुसार, गया जाने वाले वंशजों को वहां पर स्थित प्रेतशिला पर कुश बिछाकर इन मंत्रों से पितरों का आवाह्न कर पिंडदान करना चाहिए-

ऊं अस्मत्कुले मृता येतु गतिर्येषां न विद्यते।
आवाहयिष्येतान् सर्वान् दर्भपृष्ठे तिलोदके।।

डॉ. मिश्र ने बताया कि विद्यापति ने भारतीय संस्कृति के अनुरूप किसी भी प्रेत या पितर को श्राद्ध से मुक्त नहीं किया है. यानी किसी भी कुल में जन्म लेने वाले वंशजों को अपने पितरों का श्राद्ध करना ही चाहिए. अज्ञात कुलों के पितरों के श्राद्ध के लिए जो मंत्र बताया गया है-

येऽबान्धवा बान्धवा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
ते सर्वेतृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा।।

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