Rama Ekadashi 2018: कार्तिक महीने के कृष्णपक्ष में आने वाली एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है. ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान कृष्ण की उपासना करने और व्रत रखने से मनवांछित कामना पूरी होती है. रमा एकादशी को रम्भा एकादशी भी कहते हैं. इस दिन वासुदेव श्री कृष्ण के केशव रूप की उपासना की जाती है. कहते हैं कि इस दिन की पूजा से कान्हा से साक्षात्कार भी संभव हैं. Also Read - Rama Ekadashi 2019: रमा एकादशी तिथि, महत्‍व, व्रत कथा, पूजन विधि...

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हर साल यह दिवाली से ठीक 4 दिन पहले आता है. इस बार रमा एकादशी व्रत 3 नवंबर को है.

रमा एकादशी तिथि प्रारम्भ: 3 नवंबर को को 05:10 बजे

रमा एकादशी तिथि समाप्त: 4 नवंबर को 03:13 बजे

रमा एकादशी पारण समय : 4 नवम्बर को सुबह 08:47 से 08:49 बजे तक

ध्यान रहे कि वैष्णव रमा एकादशी 4 नवम्बर को होगी इस बार, जिसका पारण 5 नवंबर को होगा. पारण का समय सुबह 06:40 से 08:50 तक का होगा.

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Significance of Rama Ekadashi: रमा एकादशी का महत्व

एकादशी व्रत सभी व्रतों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. साल के हर महीने में एकादशी का व्रत दो बार आता है. एक बार शुक्ल पक्ष में और दूसरा कृष्ण पक्ष में. यानी पूरे साल में करीब 24 एकादशी व्रत आता है. लेकिन जिस साल मलमास लगता है, उस साल एकादशी व्रत की संख्या 26 हो जाती है. जाहिर है चंद्रमा की स्थिति के आधार पर ही व्रत रखा जाता है.

एकादशी व्रत रखने से मन और शरीर दोनों स्वस्थ रहता है. रोग से दूर रहते हैं और एकाग्रता बढ़ती है. ऐसी मान्यता है कि अगर आप कोई भी व्रत नहीं रखते, सिर्फ एकादशी व्रत रखते हैं तो आपको हर क्षेत्र में सफलता मिलेेेेगी.

रमा एकादशी या रम्भा एकादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है. यह चातुर्मास की अंतिम एकादशी होती है इसलिए इस एकादशी का महत्व और भी बढ़ जाता है. इस एकादशी का व्रत रखने से पापों का नाश तो होता ही है, साथ में महिलाओं को सुखद वैवाहिक जीवन का वरदान भी मिलता है.

Rama Ekadashi Aarti : रमा एकादशी आरती

ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता

विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी

गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी

शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है

शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै

शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै

विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी,

पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की

चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली,

नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी,

नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी

देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए

श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला

इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला

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पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी

रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया

पावन मास में करूं विनती पार करो नैया

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी

शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै

जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै

Rama Ekadashi Puja Vidhi : रमा एकादशी पूजा विधि

1. सुबह उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान कृष्ण या केशव का पूजन करें.

2. पूजा करने के बाद मस्तक पर सफेद चन्दन लगाएं. इससे मस्तिष्क शांत रहेगा.

3. भगवान कृष्ण को पंचामृत, फूल और मौसमी फल अर्पित करें.

4. श्री कृष्ण के मन्त्रों का जाप करें.

5. पूजा के दौरान गीता का पाठ भी अवश्य करें.

6. रात को चंद्रोदय के बाद दीपदान करें.

7. एकादशी के दिन रात्रि में सोने का विधान नहीं है. कहा जाता है कि एकादशी का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए रात्रि में जागरण करें.

8. एकादशी के अगले दिन यानी द्वादशी के दिन दान करें. खासतौर से जूते, छाते और वस्त्रों का दान श्रेष्ठ माना जाता है.

9. द्वादशी के दिन दान करने के बाद व्रत का पारण करें.

Rama Ekadashi Vrat Katha in Hindi : रमा एकादशी व्रत कथा

एक नगर में मुचुकुंद नाम के प्रतापी राजा थे. उनकी चंद्रभागा नाम की एक पुत्री थी. राजा ने बेटी का विवाह राजा चंद्रसेन के बेटे शोभन के साथ कर दिया. शोभन थोड़ा दुर्बल था. वह एक समय भी बिना खाएं नहीं रह सकता था.

शोभन एक बार कार्तिक के महीने में अपनी पत्नी के साथ अपने ससुराल आया था. तभी रमा एकादशी आ गई. चंद्रभागा के गृह राज्य में सभी इस व्रत को रखते थे. शोभन को भी यह व्रत रखने के लिए कहा गया. किन्तु शोभन इस बात को लेकर चिंतित हो गया कि वह तो एक पल को भी भूखा नहीं रह सकता. फिर वह रमा एकादशी का व्रत कैसे करेगा.

यह चिंता लेकर वह अपनी पत्नी के पास गया और कुछ उपाय निकलने को कहा. इस पर चंद्रभागा ने कहा कि अगर ऐसा है तो आपको राज्य से बाहर जाना होगा. क्योंकि राज्य में कोई भी ऐसा नहीं है, जो इस व्रत को ना करता हो. यहां तक कि जानवर भी अन्न ग्रहण नहीं करते.

लेकिन शोभन ने यह उपाय मानने से इंकार कर दिया और उसने व्रत करने की ठान ली. अगले दिन सभी के साथ सोभन ने भी एकादशी का व्रत किया. लेकिन वह भूख और प्यास बर्ताश्त नहीं कर सका और प्राण त्याग दिया.

चंद्रभागा सती होना चाहती थी. मगर उसके पिता ने यह आदेश दिया कि वह ऐसा ना करे और भगवान विष्णु की कृपा पर भरोसा रखे. चंद्रभागा अपने पिता की आज्ञानुसार सती नहीं हुई. वह अपने पिता के घर रहकर एकादशी के व्रत करने लगी.

उधर रमा एकादशी के प्रभाव से सोभन को जल से निकाल लिया गया और भगवान विष्णु की कृपा से उसे मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण तथा शत्रु रहित देवपुर नाम का एक उत्तम नगर प्राप्त हुआ. उसे वहां का राजा बना दिया गया. उसके महल में रत्न तथा स्वर्ण के खंभे लगे हुए थे. राजा सोभन स्वर्ण तथा मणियों के सिंहासन पर सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए बैठा था.

गंधर्व तथा अप्सराएं नृत्य कर उसकी स्तुति कर रहे थे. उस समय राजा सोभन मानो दूसरा इंद्र प्रतीत हो रहा था. उन्हीं दिनों मुचुकुंद नगर में रहने वाला सोमशर्मा नाम का एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा के लिए निकला हुआ था. घूमते-घूमते वह सोभन के राज्य में जा पहुंचा, उसको देखा. वह ब्राह्मण उसको राजा का जमाई जानकर उसके निकट गया.

राजा सोभन ब्राह्मण को देख आसन से उठ खड़ा हुआ और अपने ससुर तथा पत्‍नी चंद्रभागा की कुशल क्षेम पूछने लगा. सोभन की बात सुन सोमशर्मा ने कहा हे राजन हमारे राजा कुशल से हैं तथा आपकी पत्नी चंद्रभागा भी कुशल है. अब आप अपना वृत्तांत बतलाइए. आपने तो रमा एकादशी के दिन अन्न-जल ग्रहण न करने के कारण प्राण त्याग दिए थे. मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है कि ऐसा विचित्र और सुंदर नगर जिसको न तो मैंने कभी सुना और न कभी देखा है, आपको किस प्रकार प्राप्त हुआ.

इस पर सोभन ने कहा हे देव यह सब कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी के व्रत का फल है. इसी से मुझे यह अनुपम नगर प्राप्त हुआ है किंतु यह अस्थिर है. सोभन की बात सुन ब्राह्मण बोला हे राजन यह अस्थिर क्यों है और स्थिर किस प्रकार हो सकता है, सों आप मुझे समझाइए. यदि इसे स्थिर करने के लिए मैं कुछ कर सका तो वह उपाय मैं अवश्य ही करूंगा. राजा सोभन ने कहा हे ब्राह्मण देव मैंने वह व्रत विवश होकर तथा श्रद्धारहित किया था. उसके प्रभाव से मुझे यह अस्थिर नगर प्राप्त हुआ परंतु यदि तुम इस वृत्तांत को राजा मुचुकुंद की पुत्री चंद्रभागा से कहोगे तो वह इसको स्थिर बना सकती है.

राजा सोभन की बात सुन ब्राह्मण अपने नगर को लौट आया और उसने चंद्रभागा से सारा वाक्या सुनाया. इस पर राजकन्या चंद्रभागा बोली हे ब्राह्मण देव आप क्या वह सब दृश्य प्रत्यक्ष देखकर आए हैं या अपना स्वप्न कह रहे हैं. चंद्रभागा की बात सुन ब्राह्मण बोला हे राजकन्या मैंने तेरे पति सोभन तथा उसके नगर को प्रत्यक्ष देखा है किंतु वह नगर अस्थिर है. तू कोई ऐसा उपाय कर जिससे कि वह स्थिर हो जाए. ब्राह्मण की बात सुन चंद्रभागा बोली हे ब्राह्मण देव आप मुझे उस नगर में ले चलिए मैं अपने पति को देखना चाहती हूं. मैं अपने व्रत के प्रभाव से उस नगर को स्थिर बना दूंगी.

चंद्रभागा के वचनों को सुनकर वह ब्राह्मण उसे मंदराचल पर्वत के पास वामदेव के आश्रम में ले गया. वामदेव ने उसकी कथा को सुनकर चंद्रभागा का मंत्रों से अभिषेक किया. चंद्रभागा मंत्रों तथा व्रत के प्रभाव से दिव्य देह धारण करके पति के पास चली गई. सोभन ने अपनी पत्नी चंद्रभागा को देखकर उसे प्रसन्नतापूर्वक आसन पर अपने पास बैठा लिया.

चंद्रभागा ने कहा हे स्वामी अब आप मेरे पुण्य को सुनिए जब मैं अपने पिता के घर में आठ वर्ष की थी तब ही से मैं सविधि एकादशी का व्रत कर रही हूं. उन्हीं व्रतों के प्रभाव से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा और सभी कर्मों से परिपूर्ण होकर प्रलय के अंत तक स्थिर रहेगा. चंद्रभागा दिव्य स्वरूप धारण करके तथा दिव्य वस्त्रालंकारो से सजकर अपने पति के साथ सुखपूर्वक रहने लगी.

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