दिवाली के दौरान जब पूरा देश भगवान राम की महिमा का बखान करने के साथ उनकी पूजा करता है, वहीं प्रयागराज के कटरा क्षेत्र में लोग असुरों के राजा रावण की पूजा करते हैं. ऐसा कहा जाता है कि कटरा रावण का ननिहाल है और यहां के लोग उनकी तारीफ करते हैं. उनके सम्मान में शोभायात्रा निकाली जाती है और रामलीला में उनके चरित्र का विशेष बखान किया जाता है.

रामायण के अनुसार, ऋषि भारद्वाज ने अपनी बेटी इलाविदा का विवाह विश्रवा के साथ किया था और इलाविदा ने धन के स्वामी और लंका के मूल शासक रहे कुबेर को जन्म दिया था.

बाद में विश्रवा ने सुमाली की बेटी कैकेसी से भी विवाह किया, जिनसे उनके चार बच्चे हुए. इनमें सबसे बड़ा रावण था, जिसने अपने सौतेले भाई कुबेर को राज्य से खदेड़कर सिंहासन पर कब्जा जमा लिया था.

संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान रामनरेश त्रिपाठी ने कहा, “ऋषि भारद्वाज का आश्रम उसी स्थान पर है, जिसे आज स्थानीय लोग कटरा के नाम से जानते हैं. इस स्थान को आज भी लोग रावण के ननिहाल के रूप में जानते हैं.”

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उन्होंने कहा कि अन्य सभी राम लीलाएं 29 सितंबर से नवरात्रि के पहले दिन से शुरू होंगी. वहीं कटरा की राम लीला 28 सितंबर को शुरू होगी.

कटरा और पथरचट्टी शहर के दो प्रमुख और सबसे पुराने राम लीलाओं का निर्देशन करने वाले अश्विनी अग्रवाल का कहना है, “रामलीला के पहले दिन रावण का जन्म होगा और उसके बाद उसके बाल्यावस्था से लेकर वयस्कता तक के प्रसंगों को दिखाया जाएगा.”

कटरा की रामलीला इस मायने में भी अलग मानी जाती है, क्योंकि इसमें देवी सीता के जन्म और उनका नाम कैसे पड़ा यह भी दिखाया जाता है.

इसके साथ ही रामलीला के आयोजक इस बात का खासा ख्याल रखते हैं कि मंच पर जो भी रावण का किरदार निभाएगा, वह ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखता हो. इसके साथ ही सिर्फ रामलीला में ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोग भी अवसर को यादगार बनाने के लिए ‘रावण बारात’ निकालते हैं.

इस साल कमिटी ने रावण के परिधानों और आभूषणों पर 2 लाख रुपये खर्च किए हैं. ये आभूषण असुरों के राजा ‘बारात’ के दौरान पहनने वाले हैं.

(एजेंसी से इनपुट)

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