Ravidas Jayanti 2019: हमारा देश साधु-संतों और ऋषि-मुनियों की धरती है. यहां पर सदियों से अनेक महान संतों ने जन्म लेकर भारतभूमि को धन्य किया है. इसके चलते ही भारत को विश्वगुरु कहा जाता है. इन्‍हीं में से एक नाम महान संत रविदास जी का है, जिन्‍होंने देश में फैले ऊंच-नीच के भेदभाव और जाति-पात की बुराईयों को दूर करते हुए भक्ति भावना से पूरे समाज को एकता के सूत्र में बाधने का काम किया है. आइये जानते हैं संत रविदास जी के जीवन के बारे में…

संत रविदास जी का जन्‍म
गुरु रविदास (रैदास) जी का जन्म काशी में माघ पूर्णिमा के दिन रविवार को संवत 1433 को हुआ था. इसी दिन हमारे देश में महान संत गुरु रविदास की जयंती बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. उनके जन्म के बारे में एक दोहा प्रचलित है.

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कहा जाता है कि संत रविदास जी के पिता रघ्घू या राघवदास और माता का नाम करमा बाई था. उनकी पत्नी लोना एवं एक पुत्र विजयदास हुए।उनकी एक पुत्री रविदासिनी थी. रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था. जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया. वे अपना काम पूरी लगन और मेहनत से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे.

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उनकी समयानुपालन की प्रवृति और मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे. प्रारम्भ से ही रविदास जी बहुत परोपकारी और दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था. साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था. वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे. उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे. कुछ समय बाद उन्होंने रविदास और उनकी पत्नी को अपने घर से निकाल दिया. रविदास जी पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग इमारत बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन और साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे.

रविदास जी के बारे में वो बातें जो आपने सुनीं होंगी
एक बार की बात है किसी त्यौहार पर इनके गांव वाले सभी लोग गंगास्नान के लिए जा रहे थे तो सभी ने रविदास जी से भी गंगा स्नान जाने का निवेदन किया लेकिन रविदास जी ने गंगास्नान करने जाने से मना कर दिया, क्‍योंकि उसी दिन रविदास जी ने किसी व्यक्ति को जूते बनाकर देने का वचन दिया था. फिर रविदास जी ने कहा की यदि मान लो मैं गंगा स्नान के लिए चला भी जाता हु तो मेरा ध्यान तो अपने दिए हुए वचन पर लगा रहेगा फिर यदि मैं वचन तोड़ता हु तो फिर गंगास्नान का पुण्य कैसे प्राप्त हो सकता है. जिससे यह घटना रविदास जी के कर्म के प्रति निष्ठा और वचन पालन को दर्शाता है. जिसके कारण इस घटना पर संत रविदास जी ने कहा की यदि मेरा मन सच्चा है मेरी इस जूते धोने वाली कठौती में ही गंगा है.

तब से यह कहावत प्रचलित हो गयी – “मन चंगा तो कठौती में गंगा”

अर्थात यदि हमारा मन शुद्ध है तो हमारे हृदय में ही ईश्वर निवास करते है.

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जात-पात के खिलाफ थे रविदास जी
रविदास जी हमेसा से ही जात-पात के भेदभाव के खिलाफ थे और जब भी मौका मिलता वे हमेसा सामाजिक कुरूतियों के खिलाफ हमेसा आवाज़ उठाते रहते थे. रविदास जी के गुरु रामानन्द जी थे जिनके संत और भक्ति का प्रभाव रविदास जी के उपर पड़ा था. इसी कारण रविदास जी को भी मौका मिलता वे भक्ति में तल्लीन हो जाते थे.

संत रविदास जयंती
महान संत गुरु रविदास के प्रसिद्धि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है भले ही महान संत गुरु रविदास जी हमारे बीच नहींं हैंं लेकिन उनके द्वारा दिखाए गये सामाजिक कल्याण का मार्ग आज अति महत्वपूर्ण है. जिसके कारण हर साल देश भर में संत रविदास जी की जयंती माघ महीने में पूर्णिमा के दिन बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है, जो कि इस बार 19 फरवरी को है.

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संत रविदास के जीवन से शिक्षा
भले ही महान संत गुरु रविदास जी आज हमारे समाज के बीच नहीं हैं लेकिन उनके द्वारा बताये गये उपदेश और भक्ति की भावना हमे समाज कल्याण का मार्ग दिखाते है. महान संत गुरु रविदास ने अपने जीवन के व्यवहारों से यह प्रमाणित कर दिया था कि इन्सान चाहे किसी भी कुल या जाति में जन्म ले ले लेकिन वह अपने जाति और जन्म के आधार पर कभी भी महान नहीं बनता है. जब इन्सान दुसरों के प्रति श्रद्धा और भक्ति का भाव रखते हुए लोगों के प्रति अपना जीवन न्योछावर कर दे, वहीं इन्सान सच्चे अर्थों में महान होता है और ऐसे ही लोग युगों युगों तक लोगों के दिलों में जिन्दा रहते हैं.

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