नई दिल्ली: रोहिणी व्रत जैन समुदाय का एक महत्वपूर्ण दिन है. रोहिणी व्रत का पालन मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा अपने पति की दिर्घायु के लिए किया जाता है. नक्षत्र रोहिणी, हिन्दु एवं जैन कैलेण्डर में वर्णित, सत्ताईस नक्षत्रों में से एक है. जिस दिन सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र पड़ता है, उस दिन यह व्रत किया जाता है. ऐसा माना जाता है, कि जो भी रोहिणी व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं, वो सभी प्रकार के दुखों एवं दरिद्रता से मुक्त हो जाते हैं. इस व्रत का पारण रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने पर मार्गशीर्ष नक्षत्र में किया जाता है. प्रत्येक वर्ष में बारह रोहिणी व्रत होते हैं. आमतौर पर रोहिणी व्रत का पालन तीन, पाँच या सात वर्षों तक लगातार किया जाता है. रोहिणी व्रत की उचित अवधि पाँच वर्ष, पाँच महीने है. उद्यापन के द्वारा ही इस व्रत का समापन किया जाना चाहिए. जैन धर्म में मान्यता है कि इस व्रत को पुरुष और स्त्रियां दोनों कर सकते हैं. स्त्रियों के लिए यह व्रत अनिवार्य है. इस व्रत को कम से कम 5 महीने और अधिकतम 5 साल तक करना चाहिए.

रोहिणी व्रत पूजा विधि
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ सफाई करें. इसके बाद गंगाजल युक्त पानी से स्नान-ध्यान से निवृत होकर व्रत संकल्प लें. इसके बाद आमचन कर अपने आप को शुद्ध करें. अब सबसे पहले सूर्य भगवान को जल का अर्घ्य दें. जैन धर्म में रात्रि के समय भोजन करने की मनाही है. अतः इस व्रत को करने समय फलाहार सूर्यास्त से पूर्व कर लेना चाहिए.

रोहिणी व्रत का महत्व

मान्यता है कि यह व्रत महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र के लिए किया जाता है. यह व्रत रखने से मां रोहिणी जातक के घर से कंगाली को दूर भगाकर सुख एवं समृद्धि की वर्षा करती है. व्रत की पूजा के दौरान जातक मां से यह प्रार्थना करता है उसके द्वारा की गई सभी गलतियों को वे माफ करें और उसके जीवन में बने सभी कष्टों का हरण करें.