
Renu Yadav
रेनू यादव, India.Com हिंदी में असिस्टेंट न्यूज एडिटर के पद कार्यरत हैं. हिंदी पत्रकारिता में करीब 15 वर्षों के अनुभव के दौरान उन्हें टेक्नोलॉजी, धर्म, लाइफस्टाइल, हेल्थ व अन्य विषयों ... और पढ़ें
Sakat Chauth 2026: सतातन धर्म में प्रत्येक व्रत व त्योहार अपना खास महत्व होता है और माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है. यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि व खुशहाल जीवन की कामना से रखती हैं. वहीं संतान प्राप्ति की कामना से भी इस व्रत को बहुत ही शुभ व फलदायी माना गया है. इस दिन भगवान गणेश का पूजन किया जाता है और गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संकष्टी चतुर्थी के दिन यदि विधि-विधन से गणेश जी का पूजन किया जाए तो संतान के जीवन में आ रहे सभी कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है.
हर साल माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है. पंचांग के अनुसार इस साल यह तिथि 6 जनवरी को सुबह 8 बजकर 1 मिनट पर शुरू होगी और 7 जनवरी को सुबह 6 बजकर 52 मिनट पर समाप्त होगी. संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है इसलिए इस साल 6 जनवरी को संकष्टी चतुर्थी व्रत रखा जाएगा. पंचांग के अनुसार 6 जनवरी को चंद्रोदय रात 8 बजकर 54 मिनट पर होगा.
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संकष्टी चतुर्थी को सकट चौथ या तिलकुट चौथ के नाम से भी जाना जाता है. यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं. इस पर्व का विशेष महत्व है क्योंकि कृष्ण पक्ष की चतुर्थी भगवान गणेश को प्रसन्न करने वाली मानी जाती है. सकट चौथ पर गौरी पुत्र की पूजा से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. माताएं सकट माता की भी पूजा करती हैं, जो संतान की रक्षा करती हैं. इस दिन उपवास रखकर भक्त संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं.
धर्मशास्त्रों सकट चौथ का व्रत सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक रखा जाता है. कई भक्त इस दिन निर्जला उपवास भी करते हैं, जबकि कुछ इस दिन फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं. निर्जला व्रत कठिन लगे तो फल, दूध या अन्य हल्का सात्विक भोजन ले सकते हैं, लेकिन नमक से परहेज करना चाहिए. संकष्टी चतुर्थी यानि सकट चौथ के दिन भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए गणेश जी को पंचामृत और जल से स्नान कराने के बाद घी और सिंदूर का लेप लगाएं.
इसके बाद जनेऊ, रोली, इत्र, दूर्वा, फूल, चंदन, अबीर, लौंग चढ़ाकर धूप-दीप दिखाएं. गौरी पुत्र को तिल-गुड़ के लड्डू, मोदक या तिलकुट अतिप्रिय हैं, इसलिए इसका भोग जरूर लगाएं. पूजा के बाद भगवान गणेश के सामने बैठकर ‘गं गण गणपतये नमः’ मंत्र का जाप करें और संकट नाशन गणेश स्त्रोत, गणेश अथर्वशीर्ष स्तोत्र का पाठ करें. इसके बाद व्रत कथा पढ़ें या सुनें. रात्रि के समय चंद्रमा को अर्घ्य दें और जल में थोड़ा सा दूध जरूर मिलाएं. पूजा के बाद गणेश जी को अर्पित किए गए भोग को प्रसाद के रूप में बांटें और फिर स्वंय ग्रहण करके व्रत का पारण करें.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.
इनपुट: आईएएनएस
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