Sankashti Chaturthi का पर्व भगवान गणेश की पूजा का पर्व होता है. इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से सभी प्रकार के विघ्‍न जीवन से दूर हो जाते हैं.Also Read - Sankashti Chaturthi 2020: आज संकष्टी चतुर्थी, जानें पूजन विधि, शुभ मुहूर्त और महत्व

संकष्टी चतुर्थी का महत्व
संकष्टी के दिन गणपति की पूजा से नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं. शांति बनी रहती है. ऐसा कहा जाता है कि गणेश जी घर में आ रही सारी विपदाओं को दूर करते हैं और व्यक्ति की मनोकामनाओं को पूरा करते हैं. चन्द्र दर्शन भी चतुर्थी के दिन बहुत शुभ माना जाता है. Also Read - Sankashti Chaturthi 5 October: आज संकष्टी चतुर्थी व्रत, जानें महत्व, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त

Sankashti Chaturthi Date
इस बार संकष्टी चतुर्थी का व्रत 19 अगस्‍त, सोमवार को किया जाएगा. Also Read - Sankashti chaturthi 2020: संकष्टी चतुर्थी आज, गणपति से मनचाहा वरदान पाने के लिए ऐसे करें पूजा

पूजन मुहूर्त
अभिजीत मुहूर्त- दोपहर 11:58 बजे से 12:50 तक.

पूजन विधि
सुबह स्नान कर साफ और धुले हुए कपड़े पहनें. पूजा के लिए भगवान गणेश की प्रतिमा को ईशानकोण में चौकी पर स्थापित करें. चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा पहले बिछा लें. भगवान के सामने हाथ जोड़कर पूजा और व्रत का संकल्प लें. इसके बाद पूरे दिन व्रत रखें.

शाम के समय भगवान गणेश को जल, अक्षत, दूर्वा घास, लड्डू, पान, धूप आदि अर्पित करें. अक्षत और फूल लेकर गणपति से अपनी मनोकामना कहें, उसके बाद ओम ‘गं गणपतये नम:’ मंत्र बोलते हुए गणेश जी को प्रणाम करें.

एक थाली या केले का पत्ता लें, इस पर आपको एक रोली से त्रिकोण बनाना है. त्रिकोण के अग्र भाग पर एक घी का दीपक रखें. संतान की लंबी आयु की कामना करें. पूजन उपरांत चंद्रमा को शहद, चंदन, रोली मिश्रित दूध से अर्घ्य दें. पूजन के बाद लड्डू प्रसाद स्वरूप ग्रहण करें.

व्रत कथा
सतयुग में महाराज हरिश्चंद्र के नगर में एक कुम्हार रहा करता था. एक बार उसने बर्तन बनाकर आंवा लगाया पर आंवा पका नहीं. बर्तन कच्चे रह गए. बार-बार नुकसान होते देख उसने एक तांत्रिक से पूछा तो उसने कहा कि बच्चे की बलि से ही तुम्हारा काम बनेगा.

तब उसने तपस्वी ऋषि शर्मा की मृत्यु से बेसहारा हुए उनके पुत्र को पकड़ कर सकट चौथ के दिन आंवा में डाल दिया. लेकिन बालक की माता ने उस दिन गणोश जी की पूजा की थी. बहुत तलाशने पर जब पुत्र नहीं मिला तो गणेश जी से प्रार्थना की.

सवेरे कुम्हार ने देखा कि आंवा पक गया, लेकिन बालक जीवित और सुरक्षित था. डरकर उसने राजा के सामने अपना पाप स्वीकार किया. राजा ने बालक की माता से इस चमत्कार का रहस्य पूछा तो उसने गणोश पूजा के विषय में बताया.

तब राजा ने सकट चौथ की महिमा स्वीकार की तथा पूरे नगर में गणेश पूजा करने का आदेश दिया. तबसे कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकट हारिणी माना जाता है.