नई दिल्ली: संकष्टि चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा की जाती है. इस गिन गणेश जी की पूजा करने से पुण्य की प्राप्ति होती हैं और भक्तों के सभी कष्ट भी दूर हो जाते हैं. आज श्रावण माह की तृतीया तिथि है. जो कि सुबह 9 बजकर 19 मिनट तक रहेगी. इसके बाद चतुर्थी तिथि लग जाएगी. इस दिन भगवान गणेश की और चन्द्र देव की उपासना करने का विधान है. जो कोई भी इस दिन श्री गणपति की उपासना करता है उसके जीवन के संकट टल जाते हैं. साथ ही इस दिन पूजा करने से संतान की प्राप्ति होती है और संतान सम्बन्धी समस्याएं भी दूर होती हैं. Also Read - Sankashti Chaturthi 2020: संकष्टी चतुर्थी आज, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

संकष्टि चतुर्थी पूजा विधि- Also Read - Sankashti Chaturthi 2020: संकष्ठी चतुर्थी आज, यहां जानिए मुहूर्त और व्रत विधि

– इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए. इस दिन सुबह साफ कपड़े पहनने चाहिए. Also Read - Sankashti Chaturthi 2020: आज संकष्टि चतुर्थी व्रत, गणेश पूजन में ना करें ये गलतियां

– भगवान गणेश की पूजा करके लिए चौकी स्थापित करना चाहिए. उसमें लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाना चाहिए.

– भगवान के सामने हाथ जोड़कर पूजा और व्रत का संकल्प लें और फिर उन्हें जल, अक्षत, दूर्वा घास, लड्डू, पान, धूप आदि अर्पित करें.

– इस दिन भगवान गणेश की कथा सुननी चाहिए इससे हर मनोकामना पूरी होती है.

– शाम के समय चंद्रमा को शहद, चंदन, रोली मिश्रित दूध से अर्घ्य दें. चंद्रमा को अर्घ्य देना आवश्यक माना गया है.

संकष्टि चतुर्थी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, कहा जाता है कि भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के विवाह का निमंत्रण सभी देवी-देवताओं के पास गया. विवाह का निमंत्रण भगवान विष्णु जी की ओर से दिया गया था. बारात की तैयारी होने लगी. तभी सभी देवता बारात में जाने के लिए तैयार हो रहे थे, लेकिन सबने देखा कि गणेश जी इस शुभ अवसर पर उपस्थित नहीं है. यह चर्चा का विषय बन गया और वहां देवताओं ने भगवान विष्णु जी से इसका कारण पूछ लिया. भगवान विष्णु जी कहा कि हमने गणेशजी के पिता भोलेनाथ महादेव को न्योता भेजा है. यदि गणेशजी अपने पिता के साथ आना चाहते तो आ जाते, अलग से न्योता देने की कोई आवश्यकता भी नहीं थीं. दूसरी बात यह है कि उनको सवा मन मूंग, सवा मन चावल, सवा मन घी और सवा मन लड्डू का भोजन दिनभर में चाहिए. यदि गणेशजी नहीं आएंगे तो कोई बात नहीं. दूसरे के घर जाकर इतना सारा खाना-पीना भी उचित नहीं लगता. इस बीच किसी ने सुझाव दिया कि यदि गणेशजी आ भी जाएं तो उनको द्वारपाल बनाकर बैठा देंगे कि आप घर की याद रखना. आप तो चूहे पर बैठकर धीरे-धीरे चलोगे तो बारात से बहुत पीछे रह जाओगे.

यह सुझाव भी सबको पसंद आ गया, तो विष्णु भगवान ने भी अपनी सहमति दे दी. जब गणेशजी वहां पहुंचे तो उन्हें घर की रखवाली करने को कह दिया गया. बारात चल दी, तब नारदजी ने देखा कि गणेशजी तो दरवाजे पर ही बैठे हुए हैं, तो वे गणेशजी के पास गए और रुकने का कारण पूछा. गणेशजी कहने लगे कि विष्णु भगवान ने मेरा बहुत अपमान किया है. नारदजी ने कहा कि आप अपनी मूषक सेना को आगे भेज दें, तो वह रास्ता खोद देगी जिससे उनके रथ धरती में धंस जाएगा, तब आपको सम्मानपूर्वक बुलाना पड़ेगा.  ये सुनते ही गणपति महाराज ने अपनी मूषक सेना आगे भेज दी और सेना ने वैसा ही किया. जब बारात वहां से निकली तो रथों के पहिए धरती में धंस गए. सभी ने अपने-अपने उपाय किए, परंतु पहिए नहीं निकले, बल्कि जगह-जगह से टूट गए. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए. तब तो नारदजी ने कहा- आप लोगों ने गणेशजी का अपमान करके अच्छा नहीं किया. यदि उन्हें मनाकर लाया जाए तो आपका कार्य सिद्ध हो सकता है और यह संकट टल सकता है. शंकर भगवान ने अपने दूत नंदी को भेजा और वे गणेशजी को लेकर आए.

गणेशजी का आदर-सम्मान के साथ पूजन किया गया, तब कहीं रथ के पहिए निकले. अब रथ के पहिए निकल तो गए, लेकिन वे टूट-फूट गए, तो उन्हें सुधारे कौन? पास के खेत में खाती काम कर रहा था, उसे बुलाया गया. खाती अपना कार्य करने के पहले श्री गणेशाय नम: कहकर गणेशजी की वंदना मन ही मन करने लगा. देखते ही देखते खाती ने सभी पहियों को ठीक कर दिया. तब खाती कहने लगा कि हे देवताओं! आपने सर्वप्रथम गणेशजी को नहीं मनाया होगा और न ही उनकी पूजन की होगी इसीलिए तो आपके साथ यह संकट आया है. हम तो मूरख अज्ञानी हैं, फिर भी पहले गणेशजी को पूजते हैं, उनका ध्यान करते हैं.