Shani Pradosh 2020: शनि प्रदोष को प्रदोष व्रत के सबसे महत्‍वपूर्ण व्रतों में गिना जाता है. जो प्रदोष शनिवार के दिन पड़ता है उसे शनि प्रदोष, शनि त्रयोदिशी कहा जाता है. इस व्रत को रखने से ना केवल भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्‍त होता है बल्कि शनिदेव के दोषों से भी मुक्‍ति मिलती है. इस बार शनि प्रदोष 7 मार्च, शनिवार को है. Also Read - Shani Pradosh Vrat 2021: 8 मई को है शनि प्रदोष व्रत, सुख-शांति-समृद्धि के लिए भगवान शिव की करें अराधना

शनि प्रदोष महत्‍व

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इस प्रदोष को बेहद कल्‍याणकारी माना गया है. इस व्रत को रखने से जीवन के सभी कष्‍ट दूर होते हैं. भगवान शिव और शनिदेव की कृपा प्राप्‍त होती है. जिन लोगों पर शनि की ढैया, साढ़ेसाती चल रही है उन्‍हें ये व्रत अवश्‍य रखना चाहिए. प्रदोष व्रत शनिवार को है और इस दिन शनि त्रयोदिशी भी है. इस कारण से इस व्रत का महत्‍व और बढ़ गया है. इस दिन व्रत रखने से शनिदेव से मिल रहे कष्‍ट दूर होते हैं. Also Read - Shani Pradosh Vrat 2019: साल का अंतिम शनि प्रदोष व्रत, पूजन में जरूर पढ़ें व्रत कथा...

शनि प्रदोष व्रत कथा

 

बहुत समय पहले की बात है. एक नगर में बहुत ही समृद्धशाली सेठ रहता था. उसके घर में धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी. कारोबार से लेकर व्यवहार में सेठ का आचरण सच्चा था. वह बहुत दयालु प्रवृति का था.

धर्म-कर्म के कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेता. इतनी ही धर्मात्मा पत्नी भी सेठ को मिली थी, जो हर कदम पर पुण्य कार्यों में सेठ जी का साथ देती थी. लेकिन कहते हैं भगवान अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं. उनके घर में एक ऐसा दुख था, जिसका निदान दांपत्य जीवन के कई बसंत बीतने के बाद भी नहीं हो रहा था.

दंपति को इस बात का दुख था कि विवाह के कई साल बीतने पर भी उनकी कोई संतान नहीं है. इसी दुख से पीड़ित दंपति ने तीर्थ यात्रा पर जाने का निर्णय लिया. दोनों गांव की सीमा से बाहर निकले ही थे की मार्ग में बहुत बड़े प्राचीन बरगद के नीचे एक साधु को समाधि में लीन हुआ देखा.

अब दोनों के मन में साधु का आशीर्वाद पाने की कामना जाग उठी और साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए. धीरे-धीरे समय ढ़लता गया. पूरा दिन और पूरी रात सर पर से गुजर गई पर दोनों यथावत हाथ जोड़े बैठे रहे.

प्रात:काल जब साधु समाधि से उठे और आंखे खोली तो दंपति को देखकर मंद-मंद मुस्कुराने लगे और बोले तुम्हारी पीड़ा को मैनें जान लिया है. साधु ने कहा कि एक वर्ष तक शनिवार के दिन आने वाली त्रयोदशी का उपवास रखो. तुम्हारी इच्छा पूरी होगी.

तीर्थ यात्रा से लौटने पर सेठ दंपति ने साधु की बतायी विधिनुसार शनि प्रदोष व्रत का पालन करना शुरु किया जिसके प्रताप से कालांतर में सेठानी की गोद हरी हो गई और समय आने पर सेठानी ने एक सुंदर संतान को जन्म दिया.

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