Shani Pradosh 2026 Vrat Katha: प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष रखा जाता है और यह व्रत देवो के देव महादेव को समर्पित है. पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह का प्रदोष व्रत 14 फरवरी 2026, शनिवार को रखा जाएगा और शनिवार के दिन आने वाले व्रत को शनि प्रदोष व्रत कहते हैं. ऐसे में शनि प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव की उपासना के साथ ही शनिदेव का भी पूजन करना चाहिए. ऐसा करने से भोलेनाथ का आशीर्वाद मिलता है और शनिदेव प्रसन्न होते हैं. जब शनिदेव प्रसन्न होते हैं तो कुंडली में मौजूद शनि दोष का प्रभाव भी कम होने लगता है. शनि प्रदोष व्रत के दिन पूजा-पाठ के बाद व्रत कथा अवश्य पढ़नी चाहिए. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बिना कथा शनि प्रदोष व्रत अधूरा माना जाता है.
शनि प्रदोष व्रत कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक गांव में एक ब्राह्मणी रहा करती थी जो कि पति की मृत्यु के बाद भिक्षा मांगकर अपना जीवनयापन करती थी. एक दिन ब्राह्मणी भिक्षा लेकर अपने घर लौट रही थी तभी उसे रास्ते में दो सुंदर बालक मिले जो कि अपने घर का रास्ता भटक चुके थे. बालक छोटे थे इसलिए ब्राह्मणी उन्हें अपने साथ अपने घर ले आ और उनका लालन-पोषण करने लगी. लेकिन ब्राह्मणी को एक ही चिंता सता रही थी कि आखिर ये बालक किसके हैं ये कैसे पता चलेगा?
धीरे-धीरे समय बीतने लगा और जब वे दोनों बालक थोड़े बड़े हुए तो ब्राह्मणी उन्हें लेकर ऋषि शांडिल्य के आश्रम गई और वहां ऋषि शांडिल्य से कहा कि वे अपने तप से पता करके बताएं कि आखिर ये बालक कौन हैं. ऋषि शांडिल्य ने तपोबल से बालकों के बारे में पता कर कहा, कि ये दोनों बालक विदर्भ राज के राजकुमार हैं. गंदर्भ नरेश के आक्रमण से इनके पिता का राज-पाठ छीन गया है. यदि ये दोनों बालक प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखेंगे तो इन्हें अपना राज-पाट वापस मिल जाएगा.
ऋषि शांडिल्य द्वारा बताई गई विधि से दोनों बालकों और ब्राह्मणी ने प्रदोष व्रत रखना आरंभ कर दिया. एक दिन बड़े राजकुमार की मुलाकात अंशुमती से हुई, दोनों एक-दूसरे को चाहने लगे. तब अंशुमती के पिता ने राजकुमार की सहमति से दोनों की शादी कर दी. फिर दोनों राजकुमार ने गंदर्भ पर हमला किया और उनकी जीत हुई. बता दें कि इस युद्ध में अंशुमती के पिता ने राजकुमारों की मदद की थी. दोनों राजकुमारों को अपना सिंहासन वापस मिल गया और गरीब ब्राम्हणी को भी एक खास स्थान दिया गया, जिससे उनके सारे दुख खत्म हो गए. राज-पाठ वापस मिलने का कारण प्रदोष व्रत था, जिससे उन्हें संपत्ति मिली और जीवन में खुशहाली आई.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.
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