नई दिल्ली: आज आदि गुरु शंकराचार्य की जयंती है. आदि शंकराचार्य भारत के महान दार्शनिक और धर्मप्रवर्तक थे. उन्होंने अद्वैत वेदान्त को ठोस आधार प्रदान किया. गुरु शंकराचार्यजी का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को दक्षिण राज्य केरल के कालड़ी नामक ग्राम में ब्राह्मण परिवार में हुआ था. वे अल्पायु थे. उन्होंने केवल 32 वर्ष की आयु में अपना शरीर त्याग दिया था.

उन्होंने सनातन धर्म की विविध विचारधाराओं का एकीकरण किया. उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इनकी टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं. इन्होंने भारतवर्ष में चार मठों की स्थापना की थी जो अभी तक बहुत प्रसिद्ध और पवित्र माने जाते हैं और जिन पर आसीन संन्यासी ‘शंकराचार्य’ कहे जाते हैं. वे चारों स्थान ये हैं- ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, श्रृंगेरी पीठ, द्वारिका शारदा पीठ और पुरी गोवर्धन पीठ. इन्होंने अनेक विधर्मियों को भी अपने धर्म में दीक्षित किया था. ये शंकर के अवतार माने जाते हैं.

सनातन धर्म में आदि शंकराचार्य जयंती का विशेष महत्व है. कालांतर में इन्होंने अपने अनुयायियों में नव चेतना जागृत की. दक्षिण से लेकर उत्तर, पूर्व से लेकर पश्चिम के सभी दिशा के लोगों को एक सूत्र में बांधने का काम शंकराचार्य ने किया, सनातन धर्म की पुर्नस्थापना की. ऐसे में हिन्दू धर्म में आदि शंकराचार्य को देवत्व रूप माना गया. इस दिन मंदिरों और मठों में पूजा-अर्चना के साथ-साथ हवन की जाती है. सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. हालांकि, इस साल कोरोना वायरस महामारी के चलते लोग अपने घरों में रहकर ही आदि शंकराचार्य जयंती मना रहे हैं.