Sheetla Saptami Vrat 2020: शीतला सप्‍तमी पर शीतला माता का पूजन किया जाता है. मां शीतला को प्रसन्‍न करने से जीवन की हर समस्‍या दूर हो जाती है. Also Read - Basoda 2020/Sheetla Ashtmi: बसौड़ा व शीतला अष्‍टमी पर चढ़ता है बासी प्रसाद, जानें महत्‍व, व्रत विधि

कुछ ऐसा ही किया था एक कुम्‍हारन ने. हजार साल पुरानी ये कथा काफी प्रचलित है. आज भी इस जगह पर बसौड़ा पर मेला लगता है. दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं. Also Read - Vrat Tyohar In March 2020: होली, बसोड़ा, शनि त्रयोदिशी, लक्ष्‍मी पंचमी समेत मार्च के व्रत त्‍योहार, इस दिन से शुरू होंगे Chaitra Navratri

कुम्‍हारन की भक्ति

 

एक बार शीतला माता ने सोचा कि चलो आज देखा जाए कि धरती पर मेरी पूजा कौन करता है, कौन मुझे मानता है. यही सोचकर शीतला माता इंसान का वेश धर धरती पर डुंगरी गांव (राजस्थान) आईं. उन्‍होंने देखा कि गांव में उनका मंदिर नही है, ना ही पूजा होती है.

माता शीतला गांव की गलियों में घूम रही थीं, तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) नीचे फेंका. वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा, जिससे माता के शरीर में फफोले पड़ गए. शीतला माता के पूरे शरीर में जलन होने लगी.

शीतला माता चिल्लाने लगीं, अरे में जल गई, मेरा शरीर तप रहा है, जल रहा है. कोई मेरी मदद करो. लेकिन उस गांव में किसी ने शीतला माता कि मदद नहीं की.

वहीं कुछ दूरी पर अपने घर के बहार एक कुम्हारन बैठी थी. उस कुम्हारन ने देखा कि अरे यह बूढ़ी माई तो बहुत जल गई है. इसके पूरे शरीर में तपन है. शरीर में फफोले पड़ गये हैं. वह तपन सहन नहीं कर पा रही है.

तब उस कुम्हारन ने कहा, मां तू यहां आकार बैठ जा, मैं तेरे शरीर के ऊपर ठंडा पानी डालती हूं. कुम्हारन ने उस बूढ़ी माई पर खूब ठंडा पानी डाला और बोली, ‘हे मां, मेरे घर में रात कि बनी राबड़ी रखी है, थोड़ा दही भी है, तू दही-राबड़ी खा ले’. जब बूढी माई ने ठंडी के आटे कि राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली.

तब उस कुम्हारन ने कहा, आ मां बैठ जा, तेरे सिर के बाल बिखरे हैं, ला में तेरी चोटी गूंथ देती हूं और कुम्हारन माई कि चोटी गूंथने हेतु कंघी बालो में करती रही. अचानक कुम्हारन कि नजर उस बूढ़ी माई के सिर के पीछे पड़ी तो कुम्हारन ने देखा कि एक आंख और अंदर छुपी है. यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे घबराकर भागने लगी तभी उस बूढ़ी माई ने कहा, रुक जा बेटी, तू डर मत. मैं कोई भूत प्रेत नहीं हूं. मैं शीतला देवी हूं. मैं तो इस घरती पर देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है, कौन मेरी पूजा करता है. इतना कह माता चारभुजा वाली हीरे जवाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्णमुकुट धारण किए अपने असली रुप में प्रकट हो गई.

माता के दर्शन कर कुम्हारन सोचने लगी कि अब मैं गरीब इस माता को कहां बिठाऊं. तब माता बोली- बेटी तू किस सोच में पड़ गई. तब उस कुम्हारन ने हाथ जोड़कर आंखों से आंसू बहाते हुए कहा- मां मेरे घर में तो चारों तरफ दरिद्रता है, मैं आपको कहां बिठाऊं. मेरे घर में ना तो चौकी है, ना बैठने का आसन.

तब शीतला माता प्रसन्न होकर उस कुम्हारन के घर पर खड़े हुए गधे पर बैठकर एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर की दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फेंक दिया. उस कुम्हारन से कहा, हे बेटी में तेरी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हूं, अब तुझे जो भी चाहिये मुझसे वरदान मांग ले.

तब कुम्हारन ने हाथ जोड़कर कहा, हे माता मेरी इच्छा है अब आप इसी गांव में स्थापित होकर यहीं रहो और जिस प्रकार आपने मेरे घर कि दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ कर दूर किया ऐसे ही आपको जो भी होली के बाद सप्तमी को भक्ति भाव से पूजकर ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन चढ़ाए उसके घर कि दरिद्रता को साफ कर दो. आपकी पूजा करने वाली नारी जाति (महिला) का अखंड सुहाग रखना. उसकी गोद हमेशा भरी रखना. जो पुरुष शीतला सप्तमी को नाई के यहां बाल ना कटवाये, धोबी को कपड़े धुलने ना दे और पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़ाकर, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी दरिद्रता ना आए.

तब माता बोलीं, तथास्तु. हे बेटी जो तूने वरदान मांगे हैं, मैं तुझे देती हूं. बेटी तुझे आर्शिवाद देती हूं. मेरी पूजा का मुख्य अधिकार इस धरती पर सिर्फ कुम्हार जाति का ही होगा. तभी उसी दिन से डुंगरी गांव में शीतला माता स्थापित हो गईं. उस गांव का नाम हो गया शील की डुंगरी. शील कि डुंगरी में शीतला माता का मुख्य मंदिर है. शीतला सप्तमी पर वहां बहुत विशाल मेला लगता है.