Som Pradosh Vrat: सोमवार के दिन आने वाले प्रदोष व्रत को सोम प्रदोष व्रत कहते हैं. हमेशा बेचैन और चंचल चित रखने वाले लोगों के लिए यह व्रत विशेष फलदायी होता है. इस व्रत को करने वाले लोगों को जीवन में कभी हार का सामना नहीं करना पड़ता और सभी इच्छाएं पूरी होती हैं. आप भी जानें इस सोम प्रदोष व्रत का महत्व और इसे करने विधि.

सोम प्रदोष व्रत का महत्व
शास्त्रों में प्रदोष व्रत का खास महत्व बताया गया है और इस दिन व्रत करने के कई लाभ बताए गए हैं. सोमवार के दिन आने वाला प्रदोष सभी मनोकामनाएं पूर्ण करता है. इसी तरह रविवार को आने वाला प्रदोष व्रत निरोग रखता है. वहीं जब प्रदोष मंगलवार को आता है तो वह रोगों से मुक्ति दिलाता है और जातक को सेहतमंद रखता है. बुधवार को आने वाला प्रदोष कामनाओं को सिद्ध करता है. गुरुवार के दिन जब प्रदोष व्रत आता है तो शत्रुओं का नाश करता है. शुक्रवार के दिन का प्रदोष व्रत सौभाग्य लेकर आता है और शनिवार के दिन प्रदोष व्रत करने वाले जातकों को पुत्र की प्राप्ति होती है.

सोम प्रदोष व्रत विधि:
प्रदोष काल दरअसल उस समय को कहते हैं, जब सूर्यास्त हो गया हो, लेकिन रात अभी नहीं आई हो. यानी सूर्यास्त के बाद और रात होने से पहले के बीच जो अवधि होती है, उसे ही प्रदोष काल कहा जाता है. सोम प्रदोष व्रत के दिन इसी समयावधि के दौरान यदि भगवान शंकर की विधिवत पूजा की जाती है तो वह सारी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं. सोम प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे के बीच की जाती है.

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ध्यान रहे कि यह व्रत निर्जला होता है. लेकिन अगर आप निर्जला व्रत नहीं रख सकते तो जल और फलाहार कर भी व्रत रख सकते हैं. यह है विधि:

– सुबह स्नान कर भगवान शंकर को बेलपत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप आदि चढ़ाएं और पूजा करें.
– मन में व्रत रखने का संकल्प लें.
– शाम को एक बार फिर स्नान कर भोलेनाथ की पूजा करें और दीप जलाएं. शाम को प्रदोष व्रत कथा पढ़ें. यह कथा दूसरों को सुनाने का विशेष लाभ मिलता है.

सोम प्रदोष व्रत कथा:

एक नगर में एक ब्राह्मणी अकेले रहती थी. उसके पति का स्वर्गवास हो गया था. पति के जाने के बाद उसका कोई सहारा नहीं बचा. इसलिए सुबह-सुबह वह अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती. भिक्षाटन से जो कुछ मिलता था, उससे वह अपना और अपने पुत्र का पेट पालती थी. ब्राह्मणी नियमपूर्वक प्रदोष व्रत करती थी

एक दिन ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ जब घर लौट रही थी तो रास्ते में उसे एक लड़का घायल अवस्था में रास्ते पर गिरा मिला. ब्राह्मणी को दया आ गई और वह उसे अपने घर ले आई. दरअसल, वह कोई मामूला लड़का नहीं था, वह विदर्भ राज्य का राजकुमार था. वह युद्ध में घायल हो गया था और शत्रुओं ने उसके पिता को बंदी बना लिया था. शत्रुओं के हाथों हारने के बाद वह यहां-वहां मारा-मारा फिर रहा था.

वह ब्राह्मणी के घर में ही रहने लगा. राजकुमार बेहद खूबसूरत और आकर्षक था. एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा और उस पर मोहित हो गई. अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई. उन्हें भी राजकुमार भा गया. कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए. उन्होंने वैसा ही किया.

ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती थी और उसके व्रत के प्रभाव से ही राजकुमार को गंधर्वराज की राजकुमारी अंशुमति मिली. गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के राज्य को पुनः प्राप्त कर आनन्दपूर्वक रहने लगा. राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया. ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के माहात्म्य से जैसे राजकुमार और ब्राह्मण-पुत्र के दिन फिरे, वैसे ही शंकर भगवान अपने दुसरे भक्तों के दिन भी फेरते हैं.