नई दिल्‍ली: आज बृहस्पतिवार है और इस दिन व्रत करने और बृहस्पति व्रत कथा सुनने से सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इस व्रत से धन संपत्ति की प्राप्ति होती है. जिन्हें संतान नहीं है, उन्हें संतान की प्राप्ति होती है. परिवार में सुख-शांति बढ़ती है. जिन लोगों का विवाह नहीं हो रहा, उनका जल्दी ही विवाह हो जाता है. ऐसे जातकों की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है. बुद्धि और शक्ति का वरदान प्राप्त होता है और दोष दूर होता है.Also Read - Guruwar Ke Upay: गुरुवार के दिन जरूर करें ये 4 काम, घर में नहीं होगी धन की कमी

जानें बृहस्पति व्रत की विधि
बृहस्पतिवार को सुबह-सुबह उठकर स्नान करें. नहाने के बाद ही पीले रंग के वस्त्र पहन लें और पूजा के दौरान भी इन्ही वस्त्रों को पहन कर पूजा करें. भगवान सूर्य व मां तुलसी और शालिग्राम भगवान को जल चढ़ाएं. मंदिर में भगवान विष्णु की विधिवत पूजन करें और पूजन के लिए पीली वस्तुओं का प्रयोग करें. पीले फूल, चने की दाल, पीली मिठाई, पीले चावल, और हल्दी का प्रयोग करें. इसके बाद केले के पेड़ के तने पर चने की दाल के साथ पूजा की जाती है. केले के पेड़ में हल्दी युक्त जल चढ़ाएं. केले के पेड़ की जड़ो में चने की दाल के साथ ही मुन्नके भी चढ़ाएं. इसके बाद घी का दीपक जलाकर उस पेड़ की आरती करें. केले के पेड़ के पास ही बैठकर व्रत कथा का भी पाठ करें. Also Read - Banana Tree Importance: गुरुवार को क्यों करनी चाहिए केले के पेड़ की पूजा, जानें महत्व

व्रत के दौरान पुरे दिन उपवास रखा जाता है. दिन में एक बार सूर्य ढलने के बाद भोजन किया जा सकता है. भोजन में पीली वस्तुएं खाएं तो बेहतर. लेकिन गलती से भी नमक का इस्तेमाल ना करें. प्रसाद के रूप में केला को अत्यंत शुभ माना जाता है. लेकिन व्रत रखने वाले को इस दिन केला नहीं खाना चाहिए. केला को दान में दे दें. पूजा के बाद बृहस्पति देव की कथा सुनना आवश्यक है. कहते हैं बिना कथा सुने व्रत सम्पूर्ण नहीं माना जाता और उसका पूर्ण फल नहीं मिलता. Also Read - Thursday Fast: गुरुवार व्रत से दूर होता है नौकरी-करियर का हर संकट, जानें विधि, व्रत कथा

बृहस्पति व्रत कथा
प्राचीन काल में एक प्रतापी राजा था. वह दानवीर था. वह हर बृहस्पतिवार को व्रत रखता था और गरीबों को दान देता था. लेकिन राजा की रानी को यह बात पसंद नहीं थी. वह न तो व्रत करती थी और ना ही दान करने देती थी. एक दिन राजा शिकार करने जंगल निकला. रानी अपनी दासी के साथ घर पर ही थीं. उसी समय गुरु बृहस्पतिदेव साधु का रूप धारण कर राजा के दरवाजे पर भिक्षा मांगने आए. लेकिन रानी ने साधु को भिक्षा देने की बजाय टालती रही. साधु ने दोबारा भिक्षा मांगी. रानी ने फिर काम बताकर कहा कि कुछ देर बाद आना. साधु ने कुछ देर बाद फिर भिक्षा मांगी. इस पर रानी नाराज हो गई और कहा कि मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूं. आप कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मुझे इस कष्ट से मुक्ति मिल जाए.

बृहस्पतिदेव ने कहा कि अगर तुम ऐसा ही चाहती हो तो मैं जैसा तुम्हें बताता हूं तुम वैसा ही करना. गुरुवार के दिन तुम घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिट्टी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, राजा से हजामत बनाने को कहना, भोजन में मांस मदिरा खाना, कपड़ा धोबी के यहां धुलने डालना. इस प्रकार सात बृहस्पतिवार करने से तुम्हारा समस्त धन नष्ट हो जाएगा. इतना कहकर साधु रुपी बृहस्पतिदेव अंतर्ध्यान हो गए.

साधु ने जैसा बताया, रानी वैसा ही करने लगी. तीन गुरुवार बीतते ही रानी राजा की समस्त संपत्ति नष्ट हो गई. यहां तक कि भोजन के भी लाले पड़ गए. घर की ऐसी स्थिति देख राजा दूर देश कमाने चला गया और घर में रानी अकेले रह गई. रानी ने एक दिन अपनी बहन के पास अपनी दासी को भेजा और कहा कि वहां से कुछ मांग ला, जिससे घर का काम चल सके. उस दिन गुरुवार था और रानी की बहन बृहस्पति व्रत कथा सुन रही थी. रानी की दासी वहां पहुंचकर और रानी की सारी व्यथा सुनाई. लेकिन रानी की बहन ने कोई जवाब नहीं दिया. ऐसा देखकर रानी की दासी वहां रुके बिना ही वापस चली आई.

दासी ने रानी को सारी बात बताई और कहा कि आपकी बहन ने किसी प्रकार की मदद नहीं की. उधन रानी की बहन कथा सुनकर और पूजन समाप्त करके अपनी बहन के घर आई और कहने लगी- बहन, मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी. तुम्हारी दासी मेरे घर आई थी परंतु जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली. कहो दासी क्यों गई थी.

रानी ने अपनी सारी व्यथा सुनाई. रानी की बहन ने पूरी बात सुनने के बाद कहा कि देखो बहन, भगवान बृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं. देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो.

पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया. यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई. दासी रानी से कहने लगी- हे रानी, जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी व्रत कर सकें. तब रानी ने अपनी बहन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा.

उसकी बहन ने बताया, बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन ही करें. इससे बृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं. व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहन अपने घर को लौट गई.

सात दिन के बाद जब गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा. घुड़साल में जाकर चना और गुड़ लेकर आईं. फिर उससे केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया. अब पीला भोजन कहां से आए इस बात को लेकर दोनों बहुत दुखी थे. उन्होंने व्रत रखा था इसलिए बृहस्पतिदेव उनसे प्रसन्न थे. इसलिए वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुन्दर पीला भोजन दासी को दे गए. भोजन पाकर दासी प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया.

उसके बाद वे सभी गुरुवार को व्रत और पूजन करने लगी. बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति आ गई, परंतु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी. तब दासी बोली- देखो रानी, तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया और अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है.

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रानी को समझाते हुए दासी कहती है कि बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन कराना चाहिए और धन को शुभ कार्यों में खर्च करना चाहिए, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़ेगा, स्वर्ग की प्राप्ति होगी और पित्र प्रसन्न होंगे. दासी की बात मानकर रानी अपना धन शुभ कार्यों में खर्च करने लगी, जिससे पूरे नगर में उसका यश फैलने लगा.

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