उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि मंदिरों और मठों को केवल पूजा पाठ तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इन स्थलों को राष्ट्रीय भावना के कार्यो में भी सबसे आगे रहना चाहिए. मुख्यमंत्री ब्रह्मलीन महंत दिग्विजय नाथ की 50वीं पुण्यतिथि और महंत अवैद्यनाथ की जन्म शताब्दी एवं पांचवीं पुण्यतिथि समारोह को संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि भारत के संतों की बहुत समृद्ध परंपरा रही है. जब इस देश का कोई भी पक्ष सुप्तावस्था में होता है तो उसे जागृत अवस्था में लाने के लिए भारतीय संत शक्ति समय-समय पर अपने दर्शन तथा मार्गदर्शन के माध्यम से उनको प्रेरित और प्रोत्साहित करती रही है. इसलिए मंदिरों और मठों को केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहकर उन्हें राष्ट्रीय भावना के कार्यो में भी सबसे आगे रहना चाहिए.

उन्होंने कहा कि याद कीजिए, मध्यकाल में भारत जब औरंगजेब के आतंक से त्रस्त था, उस समय खालसा पंथ की स्थापना हुई थी. योगी ने कहा, “दुनिया में ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें शांति अच्छी नहीं लगती. 11 सितंबर को ही वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ था. जबकि इसी 11 सितंबर को स्वामी विवेकानंद ने अपने ज्ञान से शिकागो में भारत का झंडा फहराया था.”

योगी ने कहा, “भारत इस दृष्टि से समृद्धशाली और सौभाग्यशाली है कि हर कालखंड में सम और विषम परिस्थिति जैसी भी रही हो, पूज्य संतों का ऋषि महर्षि और उनका आशीर्वाद इस धरा पर केवल मानव मात्र ही नहीं, जीवन मात्र के कल्याण के लिए हमारे ऋषि-मुनियों, संतों, आचार्यो ने अपने आशीर्वाद और मार्गदर्शन कर सेवा का मार्ग प्रशस्त करने का निरंतर प्रयास किया है.”

मुख्यमंत्री योगी ने कहा, “राम लीलाओं के माध्यम से हम उनकी लीलाओं को जानते हैं. इसकी शुरुआत महर्षि विश्वामित्र ने की थी. देश और दुनिया की कोई ऐसी भाषा नहीं है, जहां भगवान राम का चरित उस भाषा मे लिखा नहीं किया गया, लेकिन इसका मूल महर्षि वाल्मीकि की रामायण है.”

उन्होंने कहा, “हम भारत की समृद्ध परंपरा के वारिस हैं. आदि शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में चार पीठों की स्थापना कर भारत को जोड़ा था. उन्होंने इसके माध्यम से जागरण का कार्य पूरे देश में किया था. उन्होंने समाज के सभी उन वर्गो को अपने साथ जोड़ा, जिन्हें समाज अछूत मानता था.”