Varuthini Ekadashi 2019 का व्रत इस माह 30 अप्रैल, मंगलवार को है. इस व्रत का विशेष महत्‍व है.

व्रत कथा
नर्मदा नदी के किनारे मांधाता नाम का एक दानशील और तपस्वी राजा अपना राज्य खुशीपूर्वक चलाता था. राजा बहुत धार्मिक था और अपनी प्रजा को हमेशा खुश रखता था. एक बार राजा ने जंगल में तपस्या शुरू कर दी. इतने में जंगली भालू राजा को अकेला देख राजा का पैर खाने लगा. भालू यहीं नहीं रुका. वह राजा को घसीटता हुआ जंगल लेकर जाने लगा. राजा यह देख घबरा गए, लेकिन उन्होंने भालू को मारा नहीं और ना ही उसके साथ हिंसा की. राजा ने भगवान विष्णु की प्रार्थना शुरू कर दी. भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से भालू का वध कर दिया.

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राजा की जान तो बच गई लेकिन उनका पैर भालू खा चुका था. राजा अपने अधूरे पैर को देख बहुत निराश हुए और भगवान विष्णु से हाथ जोड़ पूछने लगे कि हे प्रभू ऐसा मेरे साथ क्यों हुआ. भगवान विष्णु ने बताया कि तुम्हारे पूर्व जन्म के कर्मों के कारण ही आज तुम्हारा यह हाल हुआ है.

राजा ने भगवान विष्णु से इसका कोई उपाय पूछा. भगवान नारायण ने कहा कि दुखी मत हो भक्त. तुम मेरी वाराह अवतार मूर्ति की पूजा करो और बरुथिनी एकादशी का व्रत करो. इनके प्रभाव से तुम फिर से पूर्ण अंगों वाले हो जाओगे. राजा ने नारायण के कहे अनुसार इस व्रत को अपार श्रद्धा से किया. कुछ दिनों के बाद ही राजा को अपने पैर वापस मिल गए.

पारण नियम
एकादशी व्रत के अगले दिन यानी कि द्वादशी तिथि को व्रत समाप्त करने को ही पारण करते हैं. द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद ही पारण किया जाता है. ध्यान रहे कि किसी भी हाल में एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले कर लेना चाहिए. यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गई हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है.

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पारण को लेकर एक नियम यह भी है कि एकादशी व्रत का पारण हरि वासर में नहीं करना चाहिए. यदि आप व्रत कर रहे हैं तो व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर की अवधि खत्म होने का इंतजार करें. हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है. आमतौर पर सूर्योदय से पहले ही यह अवधि समाप्त हो जाती है. व्रत हमेशा सुबह-सुबह ही खोलना चाहिए. दोपहर के समय व्रत ना खोलें. अगर किसी कारण आप सुबह व्रत नहीं खोल पाए हैं तो दोपहर में व्रत समाप्त ना करके इसके बाद करें.

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