Vat Savitri 2026: 16 मई को सौभाग्य का महापर्व, जानें पूजा का सही समय और वे 7 नियम जो हर व्रती को पता होने चाहिए

Vat Savitri 2026 date and time: वट सावित्री व्रत इस साल 16 मई 2026 को है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से वट वृक्ष की पूजा करने से न केवल वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है, बल्कि परिवार पर आने वाले संकट भी दूर होते हैं. यदि आप भी इस वर्ष यह व्रत रखने जा रही हैं, तो पूजा के सटीक समय और शास्त्रों में बताए गए उन 7 अनिवार्य नियमों को जानना आपके लिए बेहद जरूरी है, जिनके बिना यह साधना अधूरी मानी जाती है.

Written by: Neha Awasthi Edited by: Neha Awasthi
Updated: May 15, 2026, 10:47 PM IST

Vat Savitri 2026 date: हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है. यह व्रत हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को रखा जाता है. साल 2026 में यह महापर्व 16 मई को है. मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से वट वृक्ष की पूजा करने से पति को लंबी आयु प्राप्त होती है और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है.

2026 पूजा का शुभ मुहूर्त (Muhurat)

पंचांग के अनुसार, इस वर्ष ज्येष्ठ अमावस्या तिथि की शुरुआत 16 मई को सुबह से हो रही है. ज्योतिष गणना के आधार पर पूजा के लिए सबसे उत्तम मुहूर्त नीचे दिए गए हैं:

अमावस्या तिथि प्रारंभ: 16 मई 2026, सुबह 05:11 बजे.

अमावस्या तिथि समाप्त: 17 मई 2026, रात 01:30 बजे.

पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय: सुबह 07:12 बजे से दोपहर 12:15 बजे तक.

अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:50 बजे से 12:45 बजे तक.

इस समय पूजा करने से बचे- विशेषज्ञों का मानना है कि राहुकाल के समय पूजा करने से बचना चाहिए. 16 मई को सुबह के समय पूजा संपन्न करना सबसे अधिक फलदायी होगा.

व्रत के 7 अनिवार्य नियम (Vrat Rules)

इस व्रत की पूर्णता के लिए कुछ नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक माना गया है.

  1. वट वृक्ष की परिक्रमा: पूजा के दौरान बरगद के पेड़ की कम से कम 7 या सामर्थ्य अनुसार 108 बार परिक्रमा करनी चाहिए. परिक्रमा करते समय कच्चा सूत वृक्ष के तने पर लपेटना अनिवार्य है.
  2. बाँस के पंखे का दान: पूजा की सामग्री में बाँस का पंखा (बेना) जरूर शामिल करें. पूजा के बाद इस पंखे से हवा करने और फिर इसे दान करने की परंपरा है.
  3. भीगे चने का भोग: वट सावित्री व्रत में भीगे हुए चने का प्रसाद सबसे महत्वपूर्ण होता है. इसी प्रसाद को ग्रहण कर व्रत खोला जाता है.
  4. सोलह श्रृंगार: व्रती महिला को इस दिन पूर्ण सोलह श्रृंगार करना चाहिए. लाल या पीली साड़ी पहनना शुभ माना जाता है. काले वस्त्रों का त्याग करें.
  5. अर्घ्य देने की विधि: वट वृक्ष की जड़ में कच्चा दूध और जल मिलाकर अर्घ्य देना चाहिए. इससे पितरों और देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है.
  6. बायना निकालना: पूजा संपन्न होने के बाद अपनी सास या किसी वरिष्ठ सुहागिन महिला को वस्त्र, फल और सुहाग सामग्री का ‘बायना’ देकर उनके चरण स्पर्श जरूर करें.
  7. कथा श्रवण: वट वृक्ष के नीचे बैठकर व्रत की कथा पढ़ना या सुनना आवश्यक है. बिना कथा सुने इस व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है.

पूजा के समय क्या न करें?

सूर्यास्त के बाद वट वृक्ष की पूजा या स्पर्श नहीं करना चाहिए.

व्रत के दौरान मन में किसी के प्रति द्वेष या क्रोध न लाएं.

यदि स्वास्थ्य ठीक न हो, तो निर्जला व्रत के बजाय फलाहार लेकर व्रत करना उचित रहता है.

डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.

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