Vat Savitri Vrat Katha 2026: इंटरनेट की अधूरी कहानियों से बचें, यहां पढ़ें पौराणिक ग्रंथों पर आधारित वट सावित्री की प्रामाणिक व्रत कथा और आरती

Vat Savitri Vrat 2026: महर्षि मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर को यह कथा द्रौपदी के कष्टों के समाधान के रूप में सुनाई थी. यह बुद्धिमानी और संकट प्रबंधन का सबसे बड़ा पौराणिक उदाहरण है. वट सावित्री व्रत 2026 पर पढ़ें महाभारत के वन पर्व (अध्याय 293-299) पर आधारित सावित्री-सत्यवान की असली कथा. जानें कैसे सावित्री ने यमराज से जीते पति के प्राण.

Written by: Neha Awasthi Edited by: Neha Awasthi
Updated: May 15, 2026, 11:25 PM IST

Vat Savitri Vrat Katha 2026: वट सावित्री व्रत केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि अटूट विश्वास और विवेक की विजय का उत्सव है. अक्सर इस व्रत की कहानियों में मूल संदर्भ छूट जाते हैं. आज हम आपके लिए लेकर आए हैं महाभारत के ‘वन पर्व’ (अध्याय 293 से 299) में वर्णित वह कथा, जो स्वयं महर्षि मार्कण्डेय ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी.

॥ पौराणिक वट सावित्री व्रत कथा: युधिष्ठिर-मार्कण्डेय संवाद ॥

प्रस्तावना:

जब पांडव वनवास का कष्ट भोग रहे थे, तब द्रौपदी के त्याग को देखकर धर्मराज युधिष्ठिर भावुक हो गए. उन्होंने महर्षि मार्कण्डेय से पूछा— “हे ऋषिवर! क्या द्रौपदी के समान ही कोई अन्य पतिव्रता नारी भी हुई है, जिसने घोर संकट से अपने परिवार को उबारा हो?”

तब मार्कण्डेय जी ने उन्हें सती सावित्री की यह अमर गाथा सुनाई:

1.सावित्री का जन्म और संकल्प (अध्याय 293-295)

मद्र देश के राजा अश्वपति ने संतान के लिए 18 वर्षों तक सावित्री देवी की आराधना की. देवी के आशीर्वाद से उन्हें एक कन्या रत्न प्राप्त हुआ, जिसका नाम उन्होंने ‘सावित्री’ रखा. सावित्री जब विवाह योग्य हुई, तो उसने द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पति रूप में चुना. यद्यपि देवर्षि नारद ने चेतावनी दी कि सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष शेष है, पर सावित्री अपने धर्म से पीछे नहीं हटीं.

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2.वह अंतिम दिन और यमराज का आगमन (अध्याय 296-297)

नारद जी की भविष्यवाणी के अनुसार, ठीक एक वर्ष बाद सत्यवान की मृत्यु का दिन आया. सत्यवान लकड़ी काटने वन में गए और सावित्री उनके पीछे-पीछे गईं. अचानक सत्यवान के सिर में भयंकर वेदना हुई और वे एक वट वृक्ष के नीचे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए.

उसी क्षण साक्षात् यमराज वहां प्रकट हुए. उनका शरीर काला था और आंखें रक्त के समान लाल थीं. वे सत्यवान के सूक्ष्म प्राण लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए.

3.सावित्री और यमराज का संवाद (अध्याय 298)

सावित्री भी यमराज के पीछे चलने लगीं. यमराज ने कहा— “हे सावित्री! लौट जाओ, अब तुम्हारा साथ यहीं तक था.”

तब सावित्री ने यमराज को ‘सनातन धर्म’ का ज्ञान देते हुए कहा—

“हे देव! जहाँ पति को ले जाया जाता है, पत्नी का धर्म है कि वह वहीं जाए. विद्वान कहते हैं कि सात कदम साथ चलने से मित्रता हो जाती है. मैं उसी मित्रता के नाते आपसे कुछ कहना चाहती हूँ.” यमराज सावित्री की बुद्धिमत्ता और धर्मयुक्त बातों से प्रसन्न हुए. उन्होंने सावित्री को पति के प्राणों के अतिरिक्त तीन वरदान मांगने को कहा.

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4. चतुराई से जीती बाजी (अध्याय 299)

सावित्री ने पहले वर में ससुर की आंखों की ज्योति और राज्य मांगा. दूसरे वर में अपने पिता के लिए सौ पुत्र मांगे. अंत में, तीसरे वर के रूप में सावित्री ने कहा—

“हे प्रभु! मुझे सत्यवान से उत्पन्न होने वाले सौ यशस्वी पुत्रों का आशीर्वाद प्रदान करें.”

यमराज ने बिना सोचे ‘तथास्तु’ कह दिया. सावित्री ने मुस्कुराते हुए कहा— “हे धर्मराज! आपने ही मुझे पुत्रवती होने का वर दिया है, पर पति के बिना यह संभव नहीं. अतः अपने वरदान को सत्य सिद्ध करने के लिए आपको सत्यवान के प्राण लौटाने ही होंगे.” यमराज अपनी ही प्रतिज्ञा में बंध गए और उन्होंने सत्यवान के प्राण मुक्त कर दिए. वे वापस उसी वट वृक्ष के पास आए और सत्यवान पुनः जीवित हो उठे.

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वट सावित्री व्रत आरती Vat Savitri Vrat Aarti

जय सावित्री माता, मैया जय सावित्री माता

सत्यवान संग सोहे, शुभ मंगल दाता॥

ब्रह्म पुत्री कहलायी, अश्वपति घर आयी.

नारद की वाणी सुन, मन नहीं घबरायी॥

कर सोलह श्रृंगार, वट की पूजा की.

यम के पीछे जाकर, पति की रक्षा की॥

अंधे ससुर को ज्योति, खोया राज्य दिया.

कुल का मान बढ़ाकर, जग को धन्य किया॥

अचल सुहाग जो चाहे, शरण तुम्हारी आये.

कहे जो कथा तुम्हारी, मनवांछित फल पाये॥

आरती सावित्री जी की, जो कोई नर नारी गावे.

कहत ‘सावित्री’ सती की, अक्षय सुख पावे॥

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.

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