नई दिल्ली: मंगलवार 15 मई को एक साथ तीन महत्वपूर्ण त्योहार है. मंगलवार को वट सावित्री, ज्येष्ठ अमावस्या और शनि जयंती एक ही दिन है. इसलिए इस दिन का महत्व और भी ज्यादा बढ़ गया है. जातक एक साथ तीन व्रतों का फल प्राप्त कर सकता है. हम एक-एक कर आपको वट सावित्री, ज्येष्ठ अमावस्या और शनि जयंती का महत्व व पूजन विधि के बारे में बताएंगे.

वट सावित्री व्रत पूजन विधि:

– सुबह-सुबह उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें. इस दिन महिलाएं नये वस्त्र भी पहनती हैं.
– इसके बाद वट वृक्ष के आसपास गंगाजल का छिड़काव करके स्थान को शुद्ध करें.
– बांस की टोकरी लें और उसमें सत अनाजा भर दें.
– फिर इसके ऊपर ब्रह्माजी, सावित्री और सत्यवान की मूर्ति रखें. ध्यान रहे कि सावित्री की मूर्ति ब्रह्माजी के बाईं ओर हो और सत्यवान की दाईं ओर.
– इसके बाद वट वृक्ष को जल चढ़ाएं और फल, फूल, मौली, चने की दाल, सूत, अक्षत, धूप-दीप, रोली आदि से वट वृक्ष की पूजा करें.
– फिर बांस के पंखे से सावित्री-सत्यवान को हवा करें और बरगद के एक पत्ते को अपने बालों में लगाएं.
– वट वृक्ष के नीचेे बैठकर सावित्री और सत्यवान की कथा सुनें. आप कथा सुनाने के लिए किसी पंडित को भी बुला सकती हैं.
– व्रत कथा सुनने के बाद अखंड सुहाग की कामना करें और सूत के धागे से वट वृक्ष की तीन बार परिक्रमा करें. आप 5,11, 21, 51 या 108 बार बरगद के पेड़ की परिक्रमा कर सकती हैं. जितनी ज्यादा परिक्रमा करेंगी उतना अच्छा होगा.
– परिक्रमा पूरी करने के बाद बांस के पत्तल मेंं चने की दाल और फल, फूल नैवैद्य आदि डाल कर दान करें और ब्राह्मण को दक्षिणा दें.
– पूजा संपन्न होने के बाद जिस बांस के पंखे से सावित्री-सत्यवान को हवा किया था, उसे घर ले जाकर पति को भी हवा करें. फिर प्रसाद में चढ़े फल आदि ग्रहण करने के बाद शाम के वक्त मीठा भोजन करें.

वट सावित्री व्रत का महत्व:

सावित्री ने कठिन तपस्या कर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राणों का रक्षा की थी. सावित्री की कठिन तपस्या को देखकर यमराज को सत्वान का प्राण छोड़ना पड़ा. जब यमराज सत्यवान का प्राण हर अपने साथ ले जाने लगे तो सावित्री उनके चल पड़ी. यमराज ने उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा तो सावित्री ने सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान मांग लिया. फिर सावित्री ने कहा कि मैं एक पतिव्रता स्त्री हूं और बिना पति के मां नहीं बन सकती. यमराज को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने चने के रूप में सत्यवान के प्राण दे दिए. सावित्री ने सत्यवान के मुंह में चना रखकर फूंक दिया, जिससे वे जीवित हो गए. तभी से इस व्रत में चने का प्रसाद चढ़ाने का नियम है. वट वृक्ष के नीचे ही सावित्री ने तपस्या की थी इसीलिए इस दिन इस वृक्ष की पूजा एवं परिक्रमा भी की जाती है.
ऐसी मान्यता है कि यह व्रत विधि विधान से करने वाली स्त्रियों को अखंड सुहाग का वरदान मिलता है और उनके जीवन में खुशहाली आ जाती है. उनके घर में कभी धन की कमी नहीं होती.

ज्येष्ठ अमावस्या और शनि जयंती

– ज्येष्ठ अमावस्या को स्त्रियां वट सावित्री का व्रत रखती हैं. लेकिन इस दिन ज्येष्ठ अमावस्या और शनि जयंती भी होती है. इस दिन पुरुष भी व्रत रख सकते हैं.
– सुबह स्नान कर सूर्य और पीपल को जल चढ़ाएं.
– बहते जल में आज के दिन तिल प्रवाहित करना शुभ होता है और शनि के प्रकोप से भी निजात मिलता है.
– शनि देव की पूजा करें और शनि चालीसा पढ़ें व शनि मंत्र का जाप करें.

शुभ मुहूर्त

अमावस्या तिथि आरंभ – 19:46 बजे (14 मई 2018)

अमावस्या तिथि समाप्त – 17:17 बजे (15 मई 2018)

अमावस्या का महत्व : 

– इस दिन किए गए उपायों से पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है और उनका आर्शीवाद मिलता है. अमावस्या के दिन कलश मेें जल और काला तिल डालकर दक्षिण मुखी होकर पितरों को तर्पण देने का और पिण्ड दान करने का विशेष विधान है.

– पितरों के नाम से दान करें. शाम में आंगल में एक मुट्ठी चावल पर दक्षिण मुखी दीया रखें और जलाएं. इससे पितरों को सुख एवं शान्ति की प्राप्ति होती है.

शनि जयंती:

ज्येष्ठ मास अमावस्या के दिन शनी जयंती मनायी जाती है. इस बार शनी देव वक्रि हैं. इसलिए यदि किसी जातक पर साढ़े साती या ढैय्या चल रहा है तो वह खास उपाय कर शनि के प्रकोप से बच सकता है.

प्रातः काल उठ कर स्नान करें और शनि मंदिर मेंं दान करें. दान में सवा मीटर काला कपड़ा, उड़द की दाल, काले तिल, लौंग, लोहे
की कोई वस्तु जैसे कील या चिमटा, तिल के लड्डू आदि दान करें. माता का चरण स्पर्श करें और उनका आशीर्वाद लें. शनि चालीसा पढ़ें. हनुमान मंदिर मेंं चोला चड़ाएं.