जब भी पतिव्रता पत्नी का उदाहरण दिया जाता है, सावित्री का नाम जरूर आता है. सावित्री ने कठिन तप से अपने पति के प्राणों की रक्षा की और यमराज के हाथ से अपने पति को वापस ले आई. हर साल ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को वट सावित्र व्रत किया जाता है. इस दिन सुहागनें सत्यवान, सावित्री और यमराज की पूजा करती हैं और अपने पति की लंबी आयु की कामना करती हैं.

यह पूजा करने और कथा सुनने वाली महिलाओं को ना केवल सौभाग्य का वरदान मिलता है, बल्कि उन्हें संतान सुख भी प्राप्त होता है. वट सावित्री व्रत के दिन आप व्रत रखें या नहीं, इसकी व्रत कथा जरूर सुनें. इससे संतान और पति को स्वस्थ्य जीवन का लाभ मिलता है.

सुनेंं सावित्री व्रत कथा…

भद्र देश के एक राजा थे, जिनका नाम अश्वपति था. राजा अश्वपति के घर एक पुत्री ने जन्म लिया. राजा ने पुत्री का नाम सावित्री रखा. सावित्री अत्यंत सुंदर थीं और सर्वगुणों से सम्पन्न. सावित्री की सहेलियां अक्सर राजा द्धुमत्सेन के पुत्र सत्यवान की कीर्ति की कहानियां सुनातीं और उनकी बातें करतीं. सावित्री मन ही मन सत्यवान से प्रेम करने लगी और उन्हें पतिरूप में वरण कर लिया.

ऋषिराज नारद को जब यह बात पता चली तो वह राजा अश्वपति के पास पहुंचे और कहा कि हे राजन यह क्या कर रहे हैं आप. सत्यवान गुणवान है, धर्मात्मा है और बलवान भी है, पर उसकी आयु बहुत छोटी है. वह अल्पायु है. एक वर्ष के बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी.

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ऋषिराज नारद की बात सुनकर राजा अश्वपति घोर चिंता में डूब गए. सावित्री ने उनसे कारण पूछा, तो राजा ने कहा, पुत्री तुमने जिस राजकुमार को अपने वर के रूप में चुना है वह अल्पायु है. तुम्हे किसी और को अपना जीवनसाथी बनाना चाहिए. इस पर सावित्री ने कहा कि पिताजी, आर्य कन्याएं अपने पति का एक बार ही वरण करती है, राजा एक बार ही आज्ञा देता है और पंडित एक बार ही प्रतिज्ञा करते हैं और कन्यादान भी एक ही बार किया जाता है.

सावित्री हठ करने लगीं और बोलीं मैं सत्यवान से ही विवाह करूंगी. राजा अश्वपति ने सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया. सावित्री अपने ससुराल पहुंचते ही सास-ससुर की सेवा करने लगी. समय बीतता चला गया. अचानक सत्यवान के पिता की तबियत खराब रहने लगी और यह देखकर शत्रुओं ने राज्य पर हमला कर दिया. शत्रुओं ने उनका राज्य छीन लिया.

नारद मुनि ने सावित्री को पहले ही सत्यवान की मृत्यु के दिन के बारे में बता दिया था. वह दिन जैसे-जैसे करीब आने लगा, सावित्री अधीर होने लगी. उसने तीन दिन पहले से ही उपवास शुरू कर दिया. नारद द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया.

हर दिन की तरह सत्यवान उस दिन भी लकड़ी काटने जंगल चला गया साथ में सावित्री भी गई. जंगल में पहुंचकर सत्यवान लकड़ी काटने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गया. तभी उसके सिर में तेज दर्द होने लगा. दर्द से व्याकुल सत्यवान पेड़ से नीचे उतर गया. सावित्री अपना भविष्य समझ गई.

सत्यवान के सिर को गोद में रखकर सावित्री सत्यवान का सिर सहलाने लगी. तभी वहां यमराज आते दिखे. यमराज अपने साथ सत्यवान को ले जाने लगे. सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी. यमराज ने सावित्री को समझाने की कोशिश की कि यही विधि का विधान है. लेकिन सावित्री नहीं मानी. सावित्री की निष्ठा और पतिपरायणता को देख कर यमराज ने सावित्री से कहा कि हे देवी, तुम धन्य हो. तुम मुझसे कोई भी वरदान मांगो. सावित्री ने कहा कि मेरे सास-ससुर वनवासी और अंधे हैं, उन्हें आप दिव्य ज्योति प्रदान करें. यमराज ने कहा ऐसा ही होगा. जाओ अब लौट जाओ.

लेकिन सावित्री अपने पति सत्यवान के पीछे-पीछे चलती रही. यमराज ने कहा देवी तुम वापस जाओ. सावित्री ने कहा भगवन मुझे अपने पतिदेव के पीछे-पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है. पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य है. यह सुनकर उन्होंंने फिर से उसे एक और वर मांगने के लिए कहा.

सावित्री बोली हमारे ससुर का राज्य छिन गया है, उसे पुन: वापस दिला दें. यमराज ने सावित्री को यह वरदान भी दे दिया और कहा अब तुम लौट जाओ. लेकिन सावित्री पीछे-पीछे चलती रही. यमराज ने सावित्री को तीसरा वरदान मांगने को कहा. इस पर सावित्री ने 100 संतानों और सौभाग्य का वरदान मांगा. यमराज ने इसका वरदान भी सावित्री को दे दिया. सावित्री ने यमराज से कहा कि प्रभु मैं एक पतिव्रता पत्नी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशिर्वाद दिया है. यह सुनकर यमराज को सत्यवान का प्राण छोड़ना पड़ा. यमराज अंतध्यान हो गए और सावित्री उसी वट वृक्ष के पास आ गई जहां उसके पति का मृत शरीर पड़ा था.

सत्यवान जीवंत हो गया और दोनों खुशी-खुशी अपने राज्य की ओर चल पड़े. दोनों जब घर पहुंचे तो देखा कि माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है. इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भोगते रहे.

वट सावित्री व्रत करने और इस कथा को सुनने से उपवासक के वैवाहिक जीवन या जीवन साथी की आयु पर किसी प्रकार का कोई संकट आया भी हो तो वो टल जाता है.