
Neha Awasthi
नेहा अवस्थी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 18 सालों का अनुभव है. नेहा टीवी और डिजिटल दोनों माध्यमों की जानकार हैं. इन 18 सालों में इन्होंने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों ... और पढ़ें
Kick Day Special: आज की युवा पीढ़ी Kick Day को रिश्तों में गुस्सा, अस्वीकार या दूरी का प्रतीक मानती है. लेकिन सनातन परंपरा में किक का अर्थ न अपमान है, न हिंसा. यहां किक एक परीक्षा, चेतना का झटका और अहंकार के अंत का संकेत है. इसका सबसे गहरा और चर्चित उदाहरण मिलता है भृगु ऋषि और भगवान विष्णु की उस कथा में, जिसे आज भी धर्म और दर्शन का आधार माना जाता है. यह घटना पहली नजर में चौंकाने वाली लगती है. एक ऋषि भगवान की छाती पर लात मार देता है. लेकिन यही क्षण सनातन का सबसे बड़ा सबक भी देता है.
प्राचीन काल में ऋषियों के बीच यह प्रश्न उठा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश में से सबसे श्रेष्ठ कौन हैं. इस निर्णय के लिए भृगु ऋषि को चुना गया. भृगु ऋषि ने तय किया कि वे तीनों देवों की परीक्षा लेंगे और फिर निष्कर्ष देंगे. वे पहले ब्रह्मा के पास पहुंचे, लेकिन वहां उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिला. इसके बाद वे शिव के पास गए, जहां शिव का उग्र स्वरूप देखकर वे विचलित हो गए. अंत में भृगु ऋषि पहुंचे वैकुंठ, जहां योगनिद्रा में थे भगवान विष्णु
भृगु ऋषि ने बिना किसी भूमिका के भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर पैर रख दिया. जिसे आज की भाषा में लोग “Kick” कह सकते हैं. यह वही स्थान माना जाता है जहां देवी लक्ष्मी का वास होता है, इसलिए इस कृत्य को अत्यंत अपमानजनक माना जाता है. सभ्यता, नियम और मर्यादा के हिसाब से यह असहनीय था. देवता होते तो क्रोधित हो सकते थे. लेकिन आगे जो हुआ, वही सनातन को बाकी विचारधाराओं से अलग करता है.
भगवान विष्णु तुरंत उठे. उन्होंने न तो भृगु ऋषि को डांटा और न ही क्रोध दिखाया. उल्टा उन्होंने ऋषि के चरण पकड़कर पूछा, “ऋषिवर, आपके पैर में कहीं चोट तो नहीं लगी?” इसके बाद उन्होंने भृगु ऋषि के पैर दबाने शुरू कर दिए. यह दृश्य इतना प्रभावशाली था कि स्वयं भृगु ऋषि का अहंकार टूट गया. उन्हें समझ आ गया कि सच्ची महानता शक्ति में नहीं, बल्कि संयम और करुणा में है. यही कारण था कि भृगु ऋषि ने विष्णु को त्रिदेवों में श्रेष्ठ घोषित किया.
मान्यता है कि इस घटना के बाद देवी लक्ष्मी वैकुंठ से चली गईं. इसका अर्थ यह नहीं था कि विष्णु दोषी थे, बल्कि यह संकेत था कि जहां अपमान और अहंकार प्रवेश करता है, वहां लक्ष्मी स्थायी रूप से नहीं ठहरतीं. यह कथा समाज को यह भी सिखाती है कि धन और वैभव का सीधा संबंध मर्यादा और व्यवहार से होता है.
इस पूरी घटना से साफ है कि सनातन में “किक” किसी व्यक्ति को ठुकराने का प्रतीक नहीं है. यहां किक का अर्थ है अहंकार को ठुकराना, क्रोध को त्यागना, ईगो को पीछे छोड़ना है. भृगु ऋषि की लात शरीर पर थी, लेकिन उसका प्रभाव मन पर पड़ा. वहीं विष्णु की करुणा ने यह दिखा दिया कि सच्ची शक्ति मौन और संयम में होती है.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.
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