आज भारत और पाकिस्तान दो अलग देश हैं, लेकिन मुगल काल में दिल्ली और लाहौर एक ही साम्राज्य के अहम शहर थे. उस समय शहरों के गेट केवल एंट्री के लिए दरवाजा नहीं, बल्कि सत्ता, दिशा और आपसी संपर्क के प्रतीक माने जाते थे.
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मुगल काल में शहरों की खास योजना
मुगलों ने शहरों को बहुत योजनाबद्ध तरीके से बसाया था. गेटों के नाम उन शहरों या रास्तों पर रखे जाते थे, जहां से व्यापार, सेना और प्रशासन जुड़ा होता था. इससे यह साफ होता था कि कौन सा रास्ता सत्ता तक जाता है
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शाहजहां और शाहजहानाबाद की नीव
शाहजहां ने जब आगरा से राजधानी हटाकर दिल्ली लाई, तो शाहजहानाबाद नाम का नया शहर बसाया गया और लाल किला इसका केंद्र बना. किले के हर गेट का अलग उद्देश्य था, जो साम्राज्य की कार्यप्रणाली को दर्शाता था.
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लाल किले का लाहौरी गेट क्यों खास था
लाल किले का लाहौरी गेट पश्चिम दिशा में लाहौर की ओर खुलता था. लाहौर उस समय मुगल साम्राज्य का बड़ा सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र हुआ करता था. इसी गेट से सम्राट, विदेशी मेहमान और शाही जुलूस प्रवेश करते थे.
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दिल्ली गेट की अलग पहचान
दिल्ली गेट, लाल किले का दक्षिणी प्रवेश द्वार था. यह आम लोगों, सैनिकों और कर्मचारियों के लिए इस्तेमाल होता था. यह गेट दिखाता है कि मुगल साम्राज्य केवल शाही ठाठ से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की गतिविधियों से चलता था.
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लाहौर में बना दिल्ली गेट
लाहौर की दीवारबंद नगरी में बना दिल्ली गेट पूर्व दिशा में दिल्ली की ओर खुलता था. इसी रास्ते से व्यापारी, अधिकारी और संदेशवाहक दिल्ली जाते थे. यह गेट लाहौर को सीधे मुगलों की राजधानी से जोड़ता था.
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बंटवारे के बाद भी नाम क्यों नहीं बदले
1947 के बंटवारे के बाद दिल्ली भारत में और लाहौर पाकिस्तान में चला गया, लेकिन दोनों शहरों के गेटों के नाम नहीं बदले गए. यह दिखाता है कि इतिहास और स्मृति राजनीति से ज्यादा मजबूत होती है.(Image: Pexels)
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