Diabetes Medicine Side Effects Sulphonylureas Research In Hindi 8258366
सावधान! डायबिटीज की ये आम दवा ही बढ़ा रही है शुगर, रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा
भारत में बढ़ते डायबिटीज के मामलों के बीच एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है. सालों से टाइप-2 डायबिटीज के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं को लेकर वैज्ञानिकों ने बड़ा दावा किया है.
आज के समय में डायबिटीज एक वैश्विक महामारी का रूप ले चुकी है. विडंबना यह है कि भारत को दुनिया की 'डायबिटीज की राजधानी' कहा जाता है, जहां पिछले कुछ दशकों में मरीजों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है.
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खराब जीवनशैली ने स्थिति को और गंभीर बनाया
खराब जीवनशैली, जेनेटिक्स और असंतुलित खानपान ने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है. आमतौर पर टाइप-2 डायबिटीज को नियंत्रित करने के लिए मरीज संतुलित आहार के साथ दवाओं का सहारा लेते हैं. लेकिन हाल ही में आई एक मेडिकल रिसर्च ने चिकित्सा जगत में खलबली मचा दी है.
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दवाओं पर चौंकाने वाला खुलासा
पिछले कई दशकों से टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों को सल्फोनिल्यूरिया वर्ग की दवाएं दी जा रही हैं. हाल ही में स्पेन की यूनिवर्सिटी ऑफ बार्सिलोना के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक शोध में यह बात सामने आई है कि ये दवाएं शरीर के लिए उतनी फायदेमंद नहीं हैं जितनी समझी जाती थीं.
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बीमारी घटने के बजाय बढ़ने की आशंका
शोध के अनुसार, सल्फोनिल्यूरिया वर्ग की दवाएं (जैसे ग्लिबेनक्लामाइड) शरीर में इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं की कार्यक्षमता को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचा सकती हैं, जिससे बीमारी घटने के बजाय भविष्य में और बढ़ सकती है.
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क्या कहती है वैज्ञानिकों की रिसर्च?
डायबिटीज, ओबेसिटी एंड मेटाबॉलिज्म जर्नल में प्रकाशित इस शोध का नेतृत्व प्रोफेसर एडुआर्ड मोंटान्या ने किया. इस अध्ययन में विशेष रूप से 'ग्लाइबेनक्लामाइड' नामक दवा पर ध्यान केंद्रित किया गया.
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रिसर्च के मुख्य बातें
शोध में पाया गया कि भले ही बीटा कोशिकाएं जीवित रहें, लेकिन वे धीरे-धीरे इंसुलिन बनाना और छोड़ना बंद कर देती हैं. अध्ययन के अनुसार, जब बीटा कोशिकाएं लंबे समय तक इन दवाओं के संपर्क में रहती हैं, तो उन जीनों की गतिविधि कम होने लगती है जो इंसुलिन उत्पादन के लिए जिम्मेदार होते हैं. यह प्रभाव समय के साथ और अधिक गंभीर होता चला जाता है.
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1950 से हो रहा है इस्तेमाल
सल्फोनिल्यूरिया श्रेणी की दवाओं का इतिहास काफी पुराना है. इनका उपयोग 1950 के दशक से किया जा रहा है. इनमें मुख्य रूप से ग्लिमेपिराइड, ग्लिपिज़ाइड और ग्लाइब्यूराइड जैसी दवाएं शामिल हैं. ये दवाएं रक्त शर्करा के स्तर को तुरंत कम करने में सक्षम होती हैं. इसी कारण से डॉक्टर इन्हें दशकों से मरीजों को लिखते आ रहे हैं.
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लंबे समय तक इस्तेमाल के खतरे
शुरुआत में ये दवाएं ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में बेहद प्रभावी दिखाई देती हैं, लेकिन लंबी अवधि में इनके परिणाम चिंताजनक हो सकते हैं. शोधकर्ताओं का मानना है कि लंबे समय तक इस्तेमाल से इनका असर न केवल कम होने लगता है, बल्कि यह शरीर की इंसुलिन बनाने की प्राकृतिक क्षमता को भी नष्ट कर सकती हैं.
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हो सकते हैं गंभीर साइड इफेक्ट्स
इससे मरीज की स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है और उसे अन्य गंभीर साइड इफेक्ट्स का सामना करना पड़ सकता है. यह शोध डायबिटीज के मरीजों और डॉक्टरों के लिए एक चेतावनी की तरह है. हालांकि मरीजों को बिना डॉक्टरी सलाह के अपनी दवाएं बंद नहीं करनी चाहिए, लेकिन इस दिशा में अधिक सतर्कता और वैकल्पिक उपचारों पर विचार करना समय की मांग है.
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डिस्क्लेमर:
यह लेख केवल सामान्य जानकारी को प्रदान करता है. इस खबर में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए India.com उत्तरदायी नहीं है. किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए प्रमाणित डॉक्टर की सलाह अवश्य लें.
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