साउथ चाइना सी - महाशक्तियों का नया मैदान
साउथ चाइना सी पर भारत अपनी मौजूदगी लगातार मजबूत कर रहा है. जब छोटे देशों को लगा कि वो सिर्फ अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकते, तब भारत ने एक भरोसेमंद रक्षा साझेदार के रूप में अपनी पहचान मजबूत की.
By Gargi Santosh | Updated: June 5, 2026 5:05 PM IST
साउथ चाइना सी पर भारत अपनी मौजूदगी लगातार मजबूत कर रहा है. जब छोटे देशों को लगा कि वो सिर्फ अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकते, तब भारत ने एक भरोसेमंद रक्षा साझेदार के रूप में अपनी पहचान मजबूत की.
भारत अब कई दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को आधुनिक रक्षा उपकरण उपलब्ध करा रहा है. इनमें घातक मिसाइल सिस्टम, ड्रोन, निगरानी तकनीक और आधुनिक रडार शामिल हैं, जिससे इन देशों की सुरक्षा क्षमता बढ़ रही है.
यह सब इसलिए हो पा रहा है, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों की वजह से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर पहले जैसी प्राथमिकता नहीं दिख रही. अमेरिका का फोकस दूसरे क्षेत्रों की तरफ बढ़ने से कई एशियाई देशों को अपनी सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं होने लगीं.
फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल की सफल आपूर्ति के बाद भारत की रक्षा निर्यात क्षमता पर दुनिया का भरोसा और बढ़ा. इससे भारत को वैश्विक हथियार बाजार में नई पहचान मिली.
फिलीपींस के बाद, वियतनाम के साथ भी ब्रह्मोस मिसाइल को लेकर बड़ी प्रगति हुई है. इसके अलावा इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देशों ने भी भारतीय रक्षा तकनीक में रुचि दिखाई है.
अगर साउथ चाइना सी के आसपास मौजूद देशों के पास ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें तैनात होती हैं, तो चीन के युद्धपोतों और सैन्य गतिविधियों के लिए क्षेत्र पहले जैसा आसान नहीं रहेगा. इससे शक्ति संतुलन में बदलाव आ सकता है.
भारत की खासियत यह है कि वह सिर्फ हथियार बेचने तक सीमित नहीं है. भारत ट्रेनिंग, तकनीकी सहायता, रखरखाव और लॉजिस्टिक सपोर्ट भी देता है. जिससे साझेदार देशों के साथ लंबे समय के संबंध बन रहे हैं.
इस रणनीति से भारत को दोहरा लाभ मिल रहा है. पहला, रक्षा निर्यात बढ़ने से अरबों डॉलर के आर्थिक अवसर पैदा हो रहे हैं. दूसरा, भारत साउथ चाइना सी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार के रूप में उभर रहा है, जिससे चीन के प्रभाव को संतुलित करने में भी मदद मिल रही है. (Photo from Freepik, AI)