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ड्रोन-मिसाइलों की बारिश के बीच कैसे बच निकले 60 जहाज? सरकार ने खोला सीक्रेट ऑपरेशन

मिडिल ईस्ट में पूरे संकट का केंद्र स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है. फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा रूट एनर्जी सप्लाई के लिहाज से दुनिया की लाइफ लाइन माना जाता है.

By Anjali Karmakar | Updated: August 5, 2026 10:59 PM IST

दुनिया के लिए होर्मुज स्ट्रेट इतना अहम क्यों है?

अमेरिका-इजरायल और ईरान की जंग में एक शब्द सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है- होर्मुज. ये वह समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के करीब पांचवें हिस्से का कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में LPG लेकर आ रहे जहाज गुजरते हैं. अमेरिका के एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन यानी EIA के मुताबिक, दुनिया के कुल पेट्रोलियम में से करीब 20% होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है. हर दिन लगभग 1.78 करोड़ बैरल से 2.08 करोड़ बैरल कच्चा तेल इसी रूट से जाता है.

ड्रोन-मिसाइल के बीच भारत का ऑपरेशन

मिडिल ईस्ट में जंग शुरू होने के बाद से ये रूट कई बार ब्लॉक हो चुका है. लंबे वक्त तक ये दुनिया का चोक प्वॉइंट बना रहा. US ने नाकाबंदी भी की. इस बीच ईरान और अमेरिका ने ड्रोन-मिसाइलें भी दागीं. इन सबके बीच भारत के एक नहीं, दो नहीं, बल्कि 60 जहाज सुरक्षित होर्मुज पार कर पाए हैं. ऐसा कैसे हुआ, सरकार ने संसद में पूरा सीक्रेट ऑपरेशन शेयर किया है.

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क्राइसिस मैनेजमेंट सिस्टम ने हजारों इमरजेंसी कॉल का दिया जवाब

संसद में एक सवाल के जवाब में सरकार ने कहा कि भारत के लिए माल ले जा रहे 60 कमर्शियल जहाज बढ़ी हुई सुरक्षा स्थिति के बावजूद होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित रूप से गुजर पाए.इस दौरान खाड़ी क्षेत्र से 3972 भारतीय नाविकों को स्वदेश वापस लाया गया. 24 घंटे चलने वाले क्राइसिस मैनेजमेंट सिस्टम ने हजारों इमरजेंसी कॉल और ईमेल का जवाब दिया.

सरकार ने कैसे निकाले 60 जहाज?

सरकार के मुताबिक, संकट के दौरान जहाजों की आवाजाही पर हर समय नजर रखी गई. भारतीय जहाजों के रूट, उनकी सुरक्षा और समुद्री स्थिति की लगातार मॉनिटरिंग की गई. भारतीय नौसेना की मौजूदगी और समुद्री सुरक्षा व्यवस्था का भी सहारा लिया गया. इसके अलावा जहाज मालिकों, पोर्ट अथॉरिटी और विदेश मंत्रालय के बीच रियल टाइम को-ऑर्डिनेशन बनाया गया. ऐसा इसलिए, ताकि किसी भी इमरजेंसी में तुरंत फैसला लिया जा सके.

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टीम वर्क से आसान हुआ काम

सरकार के मुताबिक, इस पूरे अभियान में कई मंत्रालयों, भारतीय नौसेना, भारतीय दूतावासों और शिपिंग कंपनियों के बीच लगातार को-ऑर्डिनेशन बनाए रखा गया. लक्ष्य सिर्फ जहाजों को सुरक्षित निकालना नहीं था, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा और सप्लाई चेन को भी प्रभावित होने से बचाना था.

हजारों भारतीय नाविकों की सुरक्षा भी रही प्राथमिकता

सरकार ने बताया कि संकटग्रस्त क्षेत्र में मौजूद भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया. उनके परिवारों के लिए हेल्पलाइन और कंट्रोल रूम एक्टिव रखे गए. शिपिंग मंत्रालय और विदेश मंत्रालय लगातार जहाजों और क्रू के संपर्क में रहे, ताकि किसी भी खतरे की स्थिति में तुरंत मदद पहुंचाई जा सके.

भारत के लिए क्या मायने?

इस पूरे घटनाक्रम ने दिखाया कि भारत अब सिर्फ ऊर्जा आयात करने वाला देश नहीं, बल्कि अपने समुद्री हितों की सुरक्षा के लिए भी तेजी से तैयार हो रहा है. 60 जहाजों को सुरक्षित निकालना सिर्फ एक लॉजिस्टिक उपलब्धि नहीं, बल्कि यह भारत की समुद्री रणनीति, अंतर-मंत्रालयी समन्वय और संकट प्रबंधन क्षमता का भी बड़ा उदाहरण माना जा रहा है.

अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ खतरा

हाल के दिनों में युद्धविराम और समुद्री आवाजाही बहाल करने की दिशा में प्रगति हुई है, लेकिन क्षेत्र में तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब भी बातचीत जारी है और कई देशों की नौसेनाएं संवेदनशील समुद्री मार्गों पर निगरानी बनाए हुए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज में किसी भी नए टकराव का असर वैश्विक तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर तुरंत पड़ सकता है.