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ग्रेट निकोबार में छिपी है भारत की सबसे रहस्यमयी जनजाति! खूंखार मगरमच्छ-बंदर है इनका मुख्य खाना

Shompen Tribe Facts: भारत के अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में शोम्पेन नाम की एक जनजाति रहती है, जिसके बारे में लोगों के पास ज्यादा जानकारी नहीं है. इसे देश की सबसे रहस्यमयी जनजातियों में से एक माना जाता है.

By Anil | Updated: February 24, 2026 7:16 PM IST

भारत की सबसे दुर्लभ जनजाति

भारत में कई दुर्लभ जनजातियां का ठिकाना है, जिसमें एक जनजाति ऐसी है कि जिसके बारे में बहुत लोगों को पता है. इस जनजाति का नाम शोम्पेन (Shompen) है.

कहां रहती है यह जनजाति?

इस जनजाति के लोग भारत के ग्रेट निकोबार आईलैंड में रहते हैं, जो अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह का हिस्सा है. यह एरिया घने जंगलों में स्थित है, जहां आम इंसान का पहुंचना बेहद मुश्किल है.

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इनका बाहरी दुनिया नहीं है कोई कनेक्शन

शोम्पेन जनजाति धरती पर सबसे अलग-थलग रहने वाले जनजातियों में से एक हैं. माना जाता है कि इनका बाहरी दुनिया से कोई भी कनेक्शन नहीं है, उन्हें बाहरी दुनिया के लोगों से दूरी बनाकर रखना ही पसंद है.

क्या खाते हैं इस जनजाति के लोग?

रिपोर्ट्स के मुतबिक, शोम्पेन लोग साल भर शिकार करते हैं. बंदर, सूअर, छिपकली और मगरमच्छ उनके भोजन का अहम खाना हैं. इसके अलावा, वे छोटे-छोटे बगीचे भी लगाते हैं, जिनमें नींबू, मिर्च और पान जैसी कई फसलें उगाते हैं.

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शोम्पेन जनजाति के इलाके में एंट्री बैन

भारत सरकार ने जनजातियों को बचाने के लिए उनके इलाके में आम लोगों की एंट्री पर बैन लगा रखा है. यही वजह है कि शोम्पेन जनजाति के बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है.

जनजाति की आबादी

सर्वाइवल इंटरनेशनल की रिपोर्ट्स की अनुसार, ग्रेट निकोबार आईलैंड में लगभग इस जनजाति की आबादी लगभग 100 से 400 के बीच बताई जाती है. इनका बाहरी दुनिया के इंसानों से कोई कनेक्शन नहीं है.

खतरे में हैं इस जनजाति के लोग

सर्वाइवल इंटरनेशनल के मुताबिक, ये जनजाति के लोग खतरे हैं. दरअसल, इस जगह पर भारत सरकार ने 9 अरब डॉलर की मेगा-डेवलपमेंट की योजना बनाई है. इस योजना में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनेगा, शिपिंग पोर्ट और पावर प्लांट का निर्माण होगा, ताकि भविष्य में करीब 6.5 लाख लोग यहां रह सकें.

मेगा प्रोजेक्ट से शोम्पेन जनजाति को खतरा

हालांकि, पर्यावरणविद् इस मेगा-डेवलपमेंट से बिल्कुल खुश नहीं है, क्योंकि उनका मानना है कि इससे शोम्पेन जनजाति की जमीनी छिन सकती है. पर्यावरणविद् का यह भी कहना है इसकी वजह से इनका बाहरी दुनिया से कनेक्शन जु़ड़ सकता है और ये गंभीर बीमारियों का शिकार हो सकते हैं.