What Is Saree Petticoat Cancer In Women Men Wearing Dhoti In India Also Suffer From This Disease Know How To Prevent It 7555939
क्या है साड़ी-पेटीकोट कैंसर? भारत में धोती पहनने वाले पुरुष भी इस बीमारी से पीड़ित, जानिए इसे कैसे रोकें
Saree-Petticoat Cancer : भारत जैसे देश में जहां महिलाओं का साड़ी पहनना हिंदू संस्कृति का अहम हिस्सा है, वहीं पुरुषों में भी धोती लपेटना आम है. लेकिन क्या आपने आज से पहले साड़ी-पेटीकोट कैंसर या धोती कैंसर के बारे में सुना है?
भारत जैसे देश में जहां महिलाओं का साड़ी पहनना हिंदू संस्कृति का अहम हिस्सा है, वहीं पुरुषों में भी धोती लपेटना आम है. लेकिन क्या आपने आज से पहले साड़ी-पेटीकोट कैंसर या धोती कैंसर के बारे में सुना है?
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भारत में बढ़ रहे केस
जी हां, आपको ये सुनकर जरूर अजीब लग सकता है, लेकिन आज हमारे देश में स्किन कैंसर के कई ऐसे मरीज है, जिन्हें ये घातक बीमारी साड़ी-पेटीकोट या धोती पहनने से हुई है.
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रिसर्च में हुआ खुलासा
हाल ही में किए गए एक शोध के अनुसार, कमर पर कसकर बांधे गए साड़ी-पेटीकोट या धोती के कारण महिलाओं और पुरुषों को त्वचा कैंसर का खतरा हो सकता है.
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क्या है कारण?
शोध में कारण बताया गया कि साड़ी के पेटीकोट का नाड़ा कमर पर ज्यादा दबाव डालता है और लंबे समय तक रगड़ने से त्वचा पर गंभीर प्रभाव पड़ता है.
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एक तरह का स्किन कैंसर
इस स्थिति को 'साड़ी कैंसर' या 'पेटीकोट कैंसर' कहा जाता है, जिसमें कमर की त्वचा पर पिग्मेंटेशन, मोटा होना और खुरदरापन जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. इसे मार्जोलिन अल्सर भी कहते हैं, जो एक तरह का स्किन कैंसर (Skin Cancer) है.
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डॉक्टरों ने क्या कहा?
डॉक्टरों का कहना है कि तंग नाड़े और रोजाना साड़ी, पेटीकोट या धोती पहनने से त्वचा में जलन और चोट हो सकती है, जो धीरे-धीरे कैंसर का रूप ले सकती है.
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कैसे बचें?
ऐसी समस्या का सामना करने के लिए ढीले पेटीकोट पहनना, मुलायम कपड़े का उपयोग करना और कमर की रोजाना सफाई करना जरूरी है.
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पुरानी चोट भी वजह
कुछ मामलों में, साड़ी पहनने से कमर पर पुरानी चोटों के कारण स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा नामक त्वचा कैंसर पाया गया है.
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चूड़ीदार पायजामा भी खतरनाक
डॉक्टरों ने बताया कि इस तरह की समस्या सिर्फ साड़ी पहनने वाली महिलाओं में ही नहीं, बल्कि धोती या चूड़ीदार पायजामा पहनने वाले पुरुषों और महिलाओं में भी देखी गई है.
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दुर्लभ है ये बीमारी
विशेषज्ञों का कहना है कि यह समस्या दुर्लभ है, लेकिन इससे बचाव के लिए जागरूकता और नियमित देखभाल बेहद जरूरी है.
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