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रडार से कैसे गायब हो जाते हैं फाइटर जेट? जानिए कैसे काम करती है स्टेल्थ टेक्नोलॉजी

Fighter Jet Stealth Technology: आधुनिक युद्ध के मैदान में अब जीत उसकी नहीं होती जो सबसे तेज है, बल्कि उसकी होती है जो दिखाई नहीं देता.

By Gaurav Barar | Updated: April 9, 2026 2:10 PM IST

कुछ विमान और मिसाइलें रडार को चकमा देने में कामयाब

आज के दौर में रडार इतने आधुनिक हो चुके हैं कि वे मीलों दूर से छोटी से छोटी वस्तु को पकड़ सकते हैं, लेकिन फिर भी कुछ विमान और मिसाइलें इन्हें चकमा देने में कामयाब हो जाती हैं. आखिर यह कैसे मुमकिन होता है? इसे समझने के लिए हमें स्टील्थ टेक्नोलॉजी को समझना होगा.

रडार कैसे काम करता है?

स्टील्थ तकनीक को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि रडार कैसे काम करता है. रडार दरअसल इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लहरें यानी तरंगें छोड़ता है. ये लहरें आसमान में उड़ रही किसी वस्तु जैसे विमान से टकराकर वापस रडार के पास आती हैं.

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कैसे पता चलती है विमान की दूरी?

इससे रडार को पता चल जाता है कि विमान कितनी दूरी पर, किस दिशा में और कितनी ऊंचाई पर है. लेकिन अगर कोई विमान इन लहरों को वापस रडार तक पहुंचने ही न दे, तो रडार के लिए वह विमान अदृश्य हो जाएगा. यही स्टील्थ तकनीक का मूल आधार है.

रडार की नजरों से बचने का विज्ञान

स्टील्थ तकनीक किसी विमान को पूरी तरह गायब नहीं करती, बल्कि उसे रडार के लिए पहचानना मुश्किल बना देती है. इसके लिए दो मुख्य तरीके अपनाए जाते हैं.

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बनावट और आकार

सामान्य विमानों की बनावट गोल होती है, जो रडार की लहरों को हर दिशा में फैला देती है, जिससे कुछ लहरें वापस रडार तक पहुंच जाती हैं. इसके उलट, स्टील्थ विमानों जैसे अमेरिका का F-35, का आकार नुकीला और कोणीय होता है. यह रडार की लहरों को इस तरह से बिखेर देता है कि वे वापस रडार के पास नहीं जा पातीं.

विमान पर की जाती है खास कोटिंग

स्टील्थ विमानों पर एक खास तरह का पेंट या कोटिंग की जाती है. यह रडार की ऊर्जा को सोख लेता है और उसे गर्मी में बदल देता है. जब रडार की लहरें विमान से टकराती हैं, तो वे वापस लौटने के बजाय सोख ली जाती हैं. F-35 जैसे आधुनिक विमान का रडार क्रॉस-सेक्शन इतना छोटा होता है कि रडार स्क्रीन पर वह एक बड़े विमान के बजाय एक छोटी सी गोल्फ बॉल जैसा दिखाई देता है.

केवल रडार ही नहीं, गर्मी और शोर भी कम

आधुनिक स्टील्थ विमान केवल रडार से ही नहीं बचते, बल्कि वे अपनी हीट सिग्नेचर को भी कम करते हैं. मिसाइलें अक्सर विमान के इंजन से निकलने वाली गर्मी को ट्रैक करती हैं. स्टील्थ विमानों के इंजन इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि वे कम गर्मी और कम शोर पैदा करें, जिससे उन्हें इन्फ्रारेड मिसाइलों से बचाना आसान हो जाता है. हालांकि, इतनी एडवांस तकनीक की कीमत भी बहुत ज्यादा होती है, एक F-35 विमान की कीमत करीब 100 मिलियन डॉलर (लगभग 800 करोड़ रुपये से ज्यादा) होती है.

मिसाइलों में स्टील्थ का इस्तेमाल

आजकल केवल विमान ही नहीं, बल्कि मिसाइलें भी स्टील्थ तकनीक से लैस हो रही हैं. AGM-158 JASSM जैसी मिसाइलें रडार की पकड़ में आए बिना लंबी दूरी तय कर सकती हैं. ये मिसाइलें खुद ही अपने लक्ष्य की पहचान करती हैं और दुश्मन के डिफेंस सिस्टम को चकमा देकर सटीक हमला करती हैं.

भारत की तैयारी क्या है?

भारत के लिए भी स्टील्थ तकनीक अब बेहद जरूरी हो गई है. जहां पाकिस्तान चीन से स्टील्थ विमान खरीदने की कोशिश कर रहा है, वहीं भारत AMCA प्रोग्राम के तहत अपना स्वदेशी स्टील्थ फाइटर जेट विकसित कर रहा है. यह विमान भारतीय वायुसेना की ताकत को कई गुना बढ़ा देगा और हमें युद्ध के मैदान में बढ़त दिलाएगा. उम्मीद है कि इस दशक के अंत तक इसके प्रोटोटाइप देखने को मिलेंगे.

क्या स्टील्थ तकनीक को पकड़ा जा सकता है?

विज्ञान की दुनिया में चोर-सिपाही का खेल हमेशा चलता रहता है. लो-फ्रीक्वेंसी वाले रडार कभी-कभी स्टील्थ विमानों को पकड़ लेते हैं. इसके जवाब में, F-35 जैसे विमान इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम का उपयोग करते हैं, जो दुश्मन के रडार को जाम कर देते हैं. स्टील्थ तकनीक ने आधुनिक युद्ध की परिभाषा बदल दी है. यह केवल छिपने की तकनीक नहीं है, बल्कि भविष्य के युद्ध जीतने का एक रणनीतिक हथियार है.