बाबर की मौत का अनसुलझा रहस्य! क्या बेटे हुमायूं की जान के बदले दी अपनी कुर्बानी? जानें क्या हैं इतिहासकारों का मत

बाबर की मौत को इतिहास में बेटे हुमायूं के लिए दी गई महान कुर्बानी माना जाता है, जहां पिता ने बेटे की सेहत के बदले अपनी कुर्बानी दे दी. आगरा में दफन होने के 9 साल बाद, वसीयत के मुताबिक बाबर के अवशेषों को काबुल ले जाया गया, जिससे उसकी कब्र का सफर भी रहस्यमयी बन गया.

Published date india.com Published: December 28, 2025 7:54 PM IST
How did Babur die
कैसे हुई बाबर की मौत?

मुगल साम्राज्य के संस्थापक जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर की मौत भारतीय इतिहास के सबसे भावुक और रहस्यमय अध्यायों में से एक है. कहा जाता है कि एक पिता ने अपने बेटे की जिंदगी बचाने के लिए अपनी जान का सौदा खुदा से कर लिया था. बाबर की मृत्यु जितनी नाटकीय थी, उसका दफन भी उतना ही विवादित रहा. आइये जानते हैं बाबर की मौत को लेकर इतिहासकारों का क्या मत है…

कुर्बानी की वो प्रसिद्ध कहानी

इतिहास के पन्नों में यह कहानी सबसे अधिक प्रचलित है कि जब बाबर का सबसे प्रिय बेटा हुमायूं गंभीर रूप से बीमार पड़ा और हकीमों ने उम्मीद छोड़ दी. तब एक सूफी संत ने सुझाव दिया कि हुमायूं की सबसे कीमती चीज कुर्बान की जाए. बाबर ने कहा कि हुमायूं के लिए सबसे कीमती चीज मैं खुद (बाबर) हूं. कहा जाता है कि बाबर ने बीमार हुमायूं के बिस्तर के तीन चक्कर लगाए और ईश्वर से प्रार्थना की कि मैंने उसका रोग ले लिया है. किंवदंती के अनुसार, उसी क्षण से हुमायूं की तबीयत सुधरने लगी और बाबर बीमार पड़ गया, जिसके कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई.

बाबर की रहस्यमयी मौत?

हालांकि, बाबर की कुर्बानी वाली स्टोरी सबसे ज्यादा फेमस है. लेकिन कई इतिहासकार इसे महज एक संयोग  बताते हैं. अपने दावे को सही साबित करने के लिए वे कहते हैं कि इब्राहिम लोदी की मां ने बाबर को धीमा जहर (Slow Poison) दिया था, जिसका असर देर से हुआ. और इसी जहग की वजह से 26 दिसंबर 1530 को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गई. वहीं, बाबर की बीमारी के स्पष्ट लक्षणों का पता नहीं चलने की वजह से इसे हमेशा के लिए एक रहस्य बना दिया.

कब्र में भी नहीं मिला सुकून

बाबर की मौत के बाद उसका दफन भी किसी रहस्य से कम नहीं रहा. उसे पहले आगरा के आराम बाग में दफनाया गया था. लेकिन बाबर की वसीयत थी कि उसे उसके वतन काबुल में दफनाया जाए. लगभग 9 साल बाद, उसके अवशेषों को आगरा से निकालकर अफगानिस्तान ले जाया गया और काबुल के ‘बाग-ए-बाबर’ में दोबारा दफनाया गया. इस स्थान परिवर्तन ने भी लोक-कथाओं में कई तरह के संदेहों और रहस्यों को जन्म दिया.

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