दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं है, बल्कि इतिहास की खुशबू वाली जगह है. आज जिस नई दिल्ली को हम भारत की राजधानी के रूप में जानते हैं, वो 10 फरवरी 1931 में बनी थी. यह सिर्फ राजधानी का नाम बदलने या नई इमारतें बनाने की बात नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश शासन की तरफ से भारत में सत्ता के एक नए केंद्र की घोषणा थी. बताया जाता है कि उस समय नई दिल्ली को बसाने में करीब 144 करोड़ रुपये की लागत आई थी. चलिए इस खबर में आपको बताते हैं कि दिल्ली देश की राजधानी कैसे बनी?
कहां से शुरू हुआ राजधानी बदलने का फैसला?
नई दिल्ली को राजधानी बनाने का विचार अचानक नहीं आया था. इसकी शुरुआत 1911 के भव्य दिल्ली दरबार से हुई, जब ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम ने ऐलान किया कि अब ब्रिटिश भारत की राजधानी कोलकाता से हटाकर दिल्ली लाई जाएगी. यह फैसला सिर्फ प्रशासनिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी था, क्योंकि दिल्ली सदियों से सत्ता का केंद्र रही है. महाभारत के इंद्रप्रस्थ से लेकर मुगलों की सल्तनत तक, दिल्ली ने कई साम्राज्यों का उत्थान-पतन देखा है. ब्रिटिश शासन भी खुद को उसी ऐतिहासिक परंपरा से जोड़ना चाहता था, ताकि लोगों पर उसका प्रभाव और मजबूत हो सके.
लुटियंस और बेकर ने बनाया सत्ता का भव्य शहर
नई दिल्ली के डिजाइन की जिम्मेदारी ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर को दी गई. इन दोनों ने मिलकर रायसीना हिल के आसपास एक ऐसी राजधानी की कल्पना की जो देखने में शानदार हो और सत्ता का संदेश भी दे. इसी योजना के तहत राष्ट्रपति भवन (तब वायसराय हाउस) और संसद भवन (तब काउंसिल हाउस) का निर्माण किया गया. इस पूरे शहर की प्लानिंग इस तरह हुई कि चौड़ी सड़कें हों, बड़ी-बड़ी इमारतें हों और राजपथ सीधे सत्ता के केंद्र तक जाए. खास बात यह थी कि इमारतों में ब्रिटिश वास्तुकला के साथ-साथ भारतीय शैली की झलक भी रखी गई.
दिल्ली को राजधानी बनाने के पीछे की रणनीति
दिल्ली को राजधानी चुने जाने के पीछे सिर्फ इतिहास नहीं बल्कि भूगोल भी बड़ी वजह था. यह शहर यमुना नदी के किनारे बसा हुआ है और उत्तर भारत के प्रशासनिक नियंत्रण के लिए बेहद उपयुक्त माना गया. उत्तर प्रदेश और हरियाणा के बीच स्थित होने के कारण यह आसानी से देश के कई हिस्सों से जुड़ सकता था. उस समय के अविभाजित भारत के नक्शे में दिल्ली लगभग बीच में आती थी, इसलिए इसे शासन के लिए नेचुरल सेंटर माना गया. यही कारण था कि अंग्रेजों ने कोलकाता जैसी पुरानी राजधानी को छोड़कर दिल्ली को चुना, ताकि पूरे भारत पर उनका नियंत्रण और प्रभाव ज्यादा मजबूत हो सके.
पुरानी दिल्ली आज भी भारतीयों का दिल
दिल्ली का इतिहास करीब 5000 साल पुराना माना जाता है. इंद्रप्रस्थ से लेकर तोमर राजपूतों, दिल्ली सल्तनत, मुगलों और फिर अंग्रेजों तक, इस शहर ने सत्ता के कई दौर देखे हैं. यहां लाल किला, कुतुब मीनार, जामा मस्जिद जैसी ऐतिहासिक धरोहरें हैं, तो वहीं इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन और संसद जैसी आधुनिक पहचान भी है. दिल्ली नाम की उत्पत्ति को लेकर कहा जाता है कि यह फारसी शब्द दहलीज या देहली से निकला है, जिसका मतलब होता है प्रवेश द्वार. 1931 में जब नई दिल्ली का उद्घाटन हुआ तो इसे साम्राज्य का ताज कहा गया, और आजादी के बाद 1947 में भी यह भारत का राजनीतिक केंद्र बनी रही. सच कहें तो दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं, यह एक जीवंत कहानी है जिसे हर दौर ने अपने रंगों से सजाया है.
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