विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव कब और किसके खिलाफ लाया जा सकता है? जानें राहुल गांधी के खिलाफ प्रिविलेज मोशन लाने से क्यों पीछे हटी सरकार
How substantive motion is different from privilege motion: राहुल गांधी के खिलाफ भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने सब्सटेंटिव मोशन लाकर उनके संसद की सदस्यता खत्म करने की मांग की है. राहुल गांधी के खिलाफ सब्सटेंटिव मोशन से पहले प्रिविलेज मोशन लाने की चर्चा थी. आइये जानते हैं इस पूरे मामले को विस्तार से...
Rahul Gandhi. (PTI File Photo)
Substantive motion against Rahul Gandhi: लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी एक बार फिर से सुर्खियों में हैं. अमेरिका-भारत ट्रेड डील पर उनके कमेंट्स के बाद भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने उनके खिलाफ सब्सटेंटिव मोशन (Substantive Motion) पेश किया. इस मोशन में सांसद ने राहुल गांधी की सदस्यता रद्द करने की मांग है. पहले चर्चा थी कि राहुल गांधी के खिलाफ सत्ता पक्ष की ओर से प्रिविलेज मोशन लाया जाएगा. आइये जानते हैं कि सरकार क्यों प्रिविलेज मोशन की सब्सटेंटिव मोशन लेकर आई, प्रिविलेज मोशन क्या है? इसे कब, कैसे और किस तरह से लाया जा सकता है...
प्रिविलेज मोशन की जगह 'सब्सटेंटिव मोशन' क्यों?
प्रिविलेज मोशन यानि विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने की सुगबुगाहट के बीच सत्ता पक्ष के सांसदों ने राहुल गांधी के खिलाफ 'सब्सटेंटिव मोशन' का रास्ता चुना है. सांसद निशिकांत दुबे ने मोशन पेश करते हुए राहुल गांधी पर भारत विरोधी एलिमेंट्स के साथ मिलीभगत का आरोप लगाते हुए उनकी सदस्यता रद्द करने और चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग की है. विशेषाधिकार प्रस्ताव आमतौर पर सदन को गुमराह करने या अपमान करने पर लाया जाता है. वहीं, सब्सटेंटिव मोशन एक स्वतंत्र और स्व-निहित प्रस्ताव होता है जो किसी अत्यंत महत्वपूर्ण मामले पर सदन की राय या इच्छा जानने के लिए लाया जाता है. इसके अलावे सब्सटेंटिव मोशन के जरिए इस पर सीधी बहस और वोटिंग की गुंजाइश ज्यादा ठोस होती है.
विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव क्या है?
विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव तब लाया जाता है जब किसी सदस्य को लगता है कि किसी मंत्री या अन्य सदस्य ने सदन के विशेषाधिकारों का उल्लंघन किया हो, सदन में गलत या भ्रामक जानकारी दी हो या सदन या उसके सदस्यों की गरिमा को ठेस पहुंचाई हो. यह प्रस्ताव किसी भी सांसद या मंत्री के खिलाफ लाया जा सकता है.
विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया
कोई भी संसद सदस्य विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने से पहले लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति की सहमति से नोटिस देता है. नोटिस मिलने पर अध्यक्ष तय करते हैं कि मामला प्रथम दृष्टया विशेषाधिकार हनन का है या नहीं. यदि अध्यक्ष अनुमति देते हैं, तो मामला विशेषाधिकार समिति (Privileges Committee) को भेजा जाता है, जहां जांच समिति गवाहों को बुलाती है, सबूत देखती है और संबंधित सदस्य का पक्ष सुनती है. सुनवाई कार्यवाही के बाद समिति अपनी सिफारिशों के साथ रिपोर्ट सदन में पेश करती है, जिस पर बहस और वोटिंग होती है.
प्रस्ताव पारित होने पर क्या होगा?
यदि सदन प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है और सदस्य दोषी पाया जाता है, तो उसे आगे से गलती को नहीं दोहराने की चेतावनी दी जा सकती है. उसे सदन से कुछ समय के लिए निलंबित (Suspend) किया जा सकता है. वहीं, गंभीर मामलों में सदस्य की सदस्यता रद्द (Expulsion) की जा सकती है.
अब तक किन प्रमुख नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई है?
भारतीय संसदीय इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जब सांसदों को कड़े दंड मिले हैं.
- इंदिरा गांधी (1978) आपातकाल के दौरान विशेषाधिकार हनन के मामले में उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई थी और उन्हें जेल भी भेजा गया था.
- सुब्रमण्यम स्वामी (1976) राज्यसभा से निष्कासित किए गए थे.
- कैश फॉर क्वेरी (2005) संसद में सवाल पूछने के बदले पैसे लेने के आरोप में 10 लोकसभा और 1 राज्यसभा सांसदों को एक साथ निष्कासित किया गया था.
- महुआ मोइत्रा (2023) हाल ही में टीएमसी सांसद को एथिक्स कमेटी की सिफारिश पर निष्कासित किया गया.
विशेषाधिकार हनन का उपयोग सदन को गुमराह करने पर होता है, जबकि सब्सटेंटिव मोशन एक बड़ा और स्वतंत्र प्रस्ताव है. संसदीय समिति की जांच के बाद अगर बहुमत से प्रस्ताव पास होता है, तो अमुक सदस्य की संसद सदस्यता भी जा सकती है.
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