
Satyam Kumar
सत्यम, बिहार से हैं. उन्होंने LS College, मुजफ्फरपुर, बिहार से जर्नलिज्म की पढ़ाई की है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया से MA In Media Governance में मास्टर्स किया है. मास्टर्स के साथ ... और पढ़ें
टाइटैनिक केवल एक जहाज नहीं था, बल्कि वह 20वीं सदी की शुरुआत में इंसानी बुद्धिमत्ता और आधुनिक इंजीनियरिंग के निर्माण का प्रतीक था. टाइटैनिक को समंदर का अजेय योद्धा इसलिए कहा गया क्योंकि इसके निर्माण में उन तकनीकों का इस्तेमाल हुआ था, जो उस दौर में कल्पना से परे थीं। लेकिन जिसे ‘कभी न डूबने वाला’ (Unsinkable) घोषित किया गया, वह अपनी पहली ही यात्रा पूरी नहीं कर सका और समंदर की गहराइयों में समा गया.
टाइटैनिक को बनाने वाली कंपनी ‘व्हाइट स्टार लाइन’ ने इसके सुरक्षा मानकों को लेकर बड़े दावे किए थे. इसकी सबसे बड़ी खूबी इसके निचले हिस्से में बने 16 वॉटरटाइट कंपार्टमेंट्स थे. इन कमरों को इस तरह डिजाइन किया गया था कि अगर जहाज का कोई हिस्सा किसी चट्टान से टकरा जाए, तो पानी केवल उसी हिस्से तक सीमित रहे. इंजीनियरों का मानना था कि अगर आगे के चार कमरे पूरी तरह पानी से भर भी जाएं, तो भी जहाज सुरक्षित तैरता रहेगा. इसके अलावा, इसमें बिजली से चलने वाले भारी दरवाजे लगे थे, जिन्हें एक बटन दबाकर तुरंत बंद किया जा सकता था. इसी डबल बॉटम हल (Hull) और जलरोधी तकनीक के कारण दुनिया को भरोसा था कि यह जहाज डूबेगा नहीं.
RMS टाइटैनिक अपने समय का सबसे बड़ा चलता-फिरता शहर था. बेलफास्ट में निर्मित यह विशालकाय ढांचा करीब 269 मीटर लंबा था. इसके अंदर आलीशान डाइनिंग हॉल, स्विमिंग पूल, जिम और शानदार केबिन थे. यह जहाज न केवल यात्रियों को ले जाता था, बल्कि ‘रॉयल मेल’ का हिस्सा होने के कारण डाक और कीमती पार्सल ढोने का भी जरिया था. इसकी भव्यता ऐसी थी कि उस समय के सबसे अमीर और रसूखदार लोग इसकी पहली यात्रा का हिस्सा बनने के लिए उत्सुक थे.
14 अप्रैल, 1912 की ठंडी रात को टाइटैनिक अपनी पूरी रफ्तार से अटलांटिक महासागर को चीरते हुए आगे बढ़ रहा था. रात के करीब 11:40 बजे, सामने एक विशाल हिमखंड (Iceberg) दिखाई दिया. जब तक पहरेदारों ने चेतावनी दी और जहाज को मोड़ने की कोशिश की गई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. हिमखंड से हुई टक्कर ने जहाज के किनारे पर एक गहरी और लंबी दरार पैदा कर दी. दुर्भाग्य से, टक्कर इतनी भयानक थी कि जहाज के 5 वॉटरटाइट कंपार्टमेंट फटने लगे. जैसा कि डिजाइन किया गया था, जहाज केवल 4 कमरों के डूबने तक ही सुरक्षित रह सकता था. पांचवें कमरे में पानी भरते ही टाइटैनिक का संतुलन बिगड़ने लगा. करीब 2 घंटे 40 मिनट के संघर्ष के बाद, यह विशाल जहाज दो टुकड़ों में टूट गया और 1500 से ज्यादा जिंदगियों के साथ समंदर के अंधेरे में खो गया.
टाइटैनिक का डूबना केवल एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि यह सुरक्षा नियमों की अनदेखी का परिणाम भी था. जहाज पर यात्रियों की तुलना में लाइफबोट्स की संख्या बहुत कम थी, क्योंकि कंपनी को लगा था कि इनकी जरूरत कभी पड़ेगी ही नहीं. आज टाइटैनिक का मलबा 12,500 फीट की गहराई में सड़ रहा है, लेकिन इसकी कहानी हमें यह सिखाती है कि प्रकृति के सामने इंसान की मशीनरी कभी अजेय नहीं हो सकती.
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