Gujarat News: सूरत में अब मोतियों यानी पर्ल फार्मिंग (Pearl Farming) की शुरुआत की जा रही है. ‘हीरों का शहर’ के नाम से पहचाने जाने वाले सूरत के लोगों के लिए यह अच्छी खबर है. जलवायु के लिहाज से देखें तो यहां का तापमान 10 से 30 डिग्री रहता है और यहां पर पानी की उपलब्धता भी बहुत है. ऐसे में झींगा मछली के अच्छे उत्पादन के बाद अब इस इलाके में पर्ल फार्मिंग आय का अच्छा जरिया बन सकता है. इसके लिए तीन लोगों ने नया साल लगते ही फार्मिंग की तैयारी कर ली है और यह संख्या 40 तक पहुंचने की उम्मीद है. Also Read - 'Statue of Unity' पर 'Statue of Liberty' से अधिक पर्यटक आते हैं, दो साल में 50 लाख से अधिक लोग पहुंचे: मोदी

इससे पहले अहमदाबाद में 10 दिन पहले ये खेती शुरू हो चुकी है. ऐसे में पर्ल फार्मिंग (Pearl farming) करने वालों लोगों को काफी उम्मीदें हैं. बता दें, भारत में तीन तरह की सीप होती हैं. कोरिओलिस, मार्जिनलिस और ओएस्टर. गंगा के बहते पानी में होने वाली कोरिओलिस सीप की क्वालिटी सबसे अच्छी होती है. मार्जिनलिस सीप ठहरे हुए और चलते पानी दोनों में ज़िंदा रह सकती है. Also Read - नोटिस पीरियड सर्व किए बिना अब नौकरी छोड़ना पड़ेगा महंगा, 18 फीसदी GST जोड़कर की जाएगी रिकवरी, जानें-पूरा मामला

खारे यानी समुद्री पानी में भी ओएस्टर की वजह से क्वालिटी अच्छी रहती है, लेकिन भारत में ये बैन है. गुजरात सहित अन्य राज्यों में प्रशिक्षण दे चुके अलखा फाउंडेशन सेक्रेटरी नरेंद्र गर्वा अभी सूरत में प्रशिक्षण दे रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि अगले 10 से 15 साल में गुजरात देश में 15 प्रतिशत उत्पादन का योगदान दे सकता है. बता दें, पर्ल की खेती के लिए गुजरात की जलवायु बेहद ही अनुकूल है. Also Read - चौंकाने वाले आंकड़े! ड्राई गुजरात में बीते चार साल में महिलाओं के शराब पीने की संख्या हुई दोगुनी, पुरुषों का आंकड़ा 50% कम हुआ

इसके कारण यहां पर 30 से 40 हजार रुपए से खेती कर सकते हैं. 15-15 फीट लंबाई-चौड़ाई में 6 फीट गहरे पानी में एक हजार सीप की खेती होती है. अमोनिया शून्य और पीएच 7 से 8 के बीच रखने के लिए मशीन रखनी होती है. एक सीप के लिए पांच लीटर पानी लगता है. आधी सीप ही जिंदा रह पाने से 1000 मोती पैदा होते हैं.

ऐसे की जाती है पर्ल फार्मिंग

सीपियों के पाउडर से बने खोल में मांस के टुकड़े में बीज इम्प्लांट करते हैं. बीज हलचल कर कैल्शियम का लिक्विड छोड़ता रहता है, जिससे एक साल में दो मोती तैयार हो जाते हैं. सांचों से डिजाइन मोती भी पा सकते हैं. पानी में यूरिया, गोबर आदि से बनी एलगी को सूखाने के बाद डाला जाता है. मोती की बहुत डिमांड है. यह मेडिकल, ज्वेलरी और कॉस्मेटिक में काम आता है. हर राज्य से 1000 से 1500 लोग खेती करने लग जाए तो 15 साल में खरबों रुपए का इम्पोर्ट कराने की ज़रूरत नहीं होगी.

बता दें, चीन में इस खेती का अलग से डिपार्टमेंट है. भारत में 15 लाख रुपए की सब्सिडी मिलती है, लेकिन उसके लिए पहले कारोबार को 25 लाख रुपए खर्च करने की शर्त है. अभी चीन, होंगकॉन्ग, कोरिया, जापान, फिलीपींस से मोती इम्पोर्ट होते हैं.