स्तन कैंसर (Breast Cancer) के बढ़ते मामलों में युवा महिलाएं भी इसकी चपेट में आ रही हैं. ऐसे में 3D मैमोग्राफी युवा महिलाओं में स्तन कैंसर को पकड़ने में कारगर टूल के रूप में देखी जा रही है. स्तन कैंसर के बढ़ते मामलों पर नई दिल्ली स्थित शालीमार बाग के मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर केयर के कंसल्टेंट और आंकोलॉजिस्ट डॉ. विनीत गोविंद गुप्ता कहते हैं, “स्तन कैंसर क्यों हो रहा है, इसके कारणों का हालांकि अभी पता नहीं लग पाया है, लेकिन यह तय है कि जितनी जल्दी इसका पता लगाया जाता है, ठीक होने के अवसर उतने ही बढ़ जाते हैं.” Also Read - World Cancer Day 2020: महिलाएं Breast Cancer को लेकर हो जाएं Alert, जानें कारण, लक्षण, बचाव

उन्होंने कहा कि परंपरागत तौर पर मैमोग्राफी 2D ही होती है, जो ब्लैक एंड व्हाइट एक्सरे फिल्म पर नतीजे प्रदर्शित करती है. इसके साथ ही इन्हें कंप्यूटर स्क्रीन पर भी देखा जा सकता है. 3D मैमोग्राम में ब्रेस्ट के की कई फोटो विभिन्न एंगलों से लिए जाते हैं, ताकि एक स्पष्ट और अधिक आयाम की इमेज तैयार की जा सके. इस तरह के मैमोग्राम की जरूरत इसलिए है, क्योंकि युवावस्था में युवतियों के स्तन के टिशू काफी घने होते हैं और सामान्य मैमोग्राम में कैंसर के गठन का पता नहीं लग पाता है. 3डी मैमोग्राम से तैयार किए गए चित्र में स्तन के टिश्यू के बीच छिपी कैंसर की गांठ को भी पकड़ा जा सकता है. Also Read - नवाजुद्दीन की बहन सायमा तमशी ने 26 की उम्र में तोड़ा दम, स्तन कैंसर ने ली जान 

डॉ. गुप्ता बताते हैं कि 3D मैमोग्राम के और कई फायदे हैं, जैसे कि ब्रेस्ट कैंसर की गांठ का जल्द से जल्द पता लगाकर उसका इलाज करना ही मैमोग्राम का मुख्य उद्देश्य है. इसके लिए 3D इमेजिंग को काफी कारगर माना जाता है. उन्होंने कहा कि 3D मैमोग्राम की तस्वीरों और सीटी स्कैनिंग में काफी समानता है और इसमें मरीज को परंपरागत मैमोग्राफी की तुलना में काफी कम मात्रा में रेडिएशन का सामना करना पड़ता है. Also Read - Breast Cancer से बढ़ता है ये खतरा, रहें एलर्ट...

डॉ. गुप्ता का कहना है कि 40 साल उम्र के आसपास पहुंच रहीं महिलाओं को हर साल मैमोग्राफी करने की सलाह दी जाती रही है. लेकिन अब उन्हें 3D इमेजिंग टैक्नोलॉजी का सहारा लेना चाहिए. इस टैक्नोलॉजी का फायदा हर उम्र की महिलाओं को मिल सकता है, लेकिन युवावस्था में कैंसर की गांठ यदि पकड़ में आ जाती है तो उसका कारगर इलाज करके मूल्यवान जान बचाई जी सकती है. उन्होंने कहा कि इसके अलावा मीनोपॉज के नजदीक या पार पहुंच चुकी महिला को भी 3D मैमोग्राफी कराने से शुरूआत में ही कैंसर की गांठ का पता लग सकता है.

दरअसल, 3D मैमोग्राफी करने की प्रोसीजर बिल्कुल 2D मैमोग्राफी की ही तरह होती है. इसमें महिला के स्तन को एक्सरे प्लेट और ट्यूबहेड के बीच रखकर कई एंगल से अनेक फोटो लिए जाते हैं. इस तरह की फोटुओं को स्लाइसेस कहा जाता है. इतने बारीक अंतर से स्तन के फोटोस्लाइसेस बनाए जाते हैं कि उसकी निगाह से छोटी से छोटी कैंसर की गठान भी छिप नहीं पाती है और उजागर होकर स्क्रीन पर दिखाई देने लगती है.