नई दिल्‍ली: कर्नाटक के शिमोगा जिले में दिसंबर 2018 के बाद से अब तक मंकी फीवर के कारण नौ लोगों की मौत हो चुकी है. मंकी फीवरी के मरीजों में पहले बेहद तेज बुखार, खांसी, सांस लेने में परेशानी, दस्त की समस्‍या सामने आती है. मंकी फीवर को क्यासनुर फॉरेस्ट डिजिज (केएफडी) भी कहा जाता है, जो धीरे-धीरे फैलता है. 2016 में पहली बार इसकी पुष्टि हुई थी. इसे क्यासनुर फॉरेस्ट डिजिज (केएफडी) भी कहा जाता है जो धीरे-धीरे फैलता है.

क्‍या है मंकी फीवर के लक्षण
मंकी फीवर के पीड़ित अक्सर तेज़ बुखार या फिर ब्लीडिंग होने की शिकायत करते हैं. इसके चलते शरीर में कंपकंपी, मानसिक अशांति का अहसास होता है. यही नहीं अनदेखी पर मौत भी हो सकती है. बीमारी घातक रूप पांचवें दिन के बाद लेना शुरू करती है. जब कंपकंपी छूटने जैसे दूसरे लक्षण दिखने शुरू होते हैं.

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कहां फैला है ‘मंकी फीवर’
कर्नाटक राज्य के स्वास्थ्य मंत्रालय ने आंकड़े जारी करते हुए बताया कि जिले में 24 दिसंबर 2018 से लेकर अब तक इस बीमारी के 100 पॉजीटिव मामलों की पहचान हुई है जिनमें से नौ लोगों की मौत हो गई. इसके अलावा इस बीमारी से 120 बंदरों की भी मौत हो गई जिनमें शुक्रवार को शिमोगा में आठ बंदरों की मौत शामिल है. एक स्वास्थ्य अधिकारी ने बताया कि अब तक 20,362 लोगों का टीकाकरण किया गया है. उन्होंने कहा कि हम निगरानी कर रहे हैं और अब तक 374 गांवों का सर्वेक्षण किया गया.

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मंकी फीवर से लोगों में दहशत
शिमोगा जिले में बीमारी फैलने से लोगों में दहशत का माहौल है. इस डर से कि इस बीमारी का इंफेक्‍शन कई और लोगों को अपने चपेट में ले सकती है स्थानीय अधिकारी फौरन हरकत में आए ताकि केडीएफ को तेज़ी से फैलने से रोका जा सके.

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पहली बार कब हुई मंकी फीवर की पहचान?
मंकी फीवर यानि केएफडी की पहचान पहली बार साल 1957 में की गई थी. सेंटर्स फॉर डिजिज कंट्रोल एंड प्रीवेंसन (सीडीसी) के मुताबिक, हर साल दुनिया भर में यह बीमारी करीब 500 लोगों को चपेट में ले रही है.

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कैसे फैलता है मंकी फीवर?
मंकी फीवर लोगों से एक दूसरे में नहीं फैलता है. बल्कि, संक्रमित जानवरों का पंजा लगने या उसके संपर्क में आने से होता है, खासकर बंदरों से. दक्षिण भारत के तीन क्षेत्रों को इस बीमारी के लिए बेहद संवेदनशील माना गया है. मंकी फीवर से पीड़ित ज्यादातर मरीज एक या दो हफ्ते में ठीक हो जाते हैं.

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