ऐसी बहुत सी बातें हम सब के साथ हो रही होती हैं, मगर जब आज एक फ्रेंड ने ये लिख कर भेजा तो…, लगा जैसे मेरी ही कहानी है , या यूं कहूं तो हर लड़की की कहानी है….(साभार-सच्ची सहेली)Also Read - Weight Gain During Period: अगर पीरियड्स के दौरान बढ़ता है आपका वजन, तो जानें आखिर क्या है इसकी वजह

आज मैं देख रही थी, दीदी सुबह से परेशान सी हैं, कुछ छिपाने की कोशिश कर रही थी. बस मम्मी से बात करती हैं और मुँह लटका कर गर्दन हिला देती हैं. कोई बहस या सवाल भी नहीं कर रही . आज हमारे साथ खेल भी नहीं रहीं, बस अकेले में बैठ कर किसी उधेड़ बुन में लगी हुई हैं. ज़्यादा पूछो तो बस यही बोलती हैं ” तुम अपना काम करो ना”. मैंने भी दो चार बार पूछा जब जवाब नहीं मिला तो खेल में लग गयी.पर मन में सवाल तो घूम रहा था, दीदी तो ऐसी नहीं थी? अचानक आज ऐसे क्यूं बीहेव कर रही हैं? आज दिन में उनको एक दो बार सर नीचे करके बैठे देखा था लगा था जैसे रो रहीं हो.मम्मी से धीरे से पूछा “दीदी को क्या हुआ”? Also Read - सेनेट्री पैड बनाने वाली यूपी के इस गांव की महिलाओं पर बनी फिल्म ने जीता ऑस्कर, खुशी की लहर

” कुछ नहीं, उसकी तबियत ठीक नहीं है, पेट में दर्द है ” मम्मी ने बताया.
“हूं.., तो बता ही देतीं, इतना नाटक क्यूं किया?” मन में सोचा. Also Read - Oscar nominations 2019: मासिक धर्म पर आधारित फिल्म 'पीरियड, इंड ऑफ सेंटेंस' ऑस्कर के लिए नॉमिनेट

आज रात से कुछ बेचैनी सी है, कुछ अजीब सा लग रहा है, बार बार कुछ गीला गीला लग रहा है. क्या है ये? किससे पूछूं? ये कोई बीमारी तो नहीं? रात काटी किसी तरह.., नहाने गयी तो कपड़ों को बाल्टी के पीछे छुपाकर डाल दिया, और भाग गयी जैसे मुसीबत ख़त्म हो गयी. बाहर आकर सोचा मम्मी से पूछूँगी मगर शब्द ही नहीं मिले, कहाँ से आया ये , इसको क्या कहूँगी नहीं समझ पायी. बच्चों को बॉडी के पार्टस पढ़ाते समय इन अँगो के नाम नहीं बताए जाते भले ही हम कितने एडवांस और शिक्षित हो रहे हों बच्चा को ये जानना कितना ज़रूरी है हम नहीं सोचते, तो मैं या कोई भी कैसे बताएगा मम्मी को?
कुछ दिन निकल गए इसी तरह मम्मी ने भी कपड़े देखे होंगे पर कुछ नहीं पूछा, ये सामाजिक हया हमें बात करने कहां देती. जब तक सिर पर ना पड़ जाए हम ऐसी चीज़ों पर बात करना नहीं चाहते. मेरा मासूम सा मन बस रोज़ थोड़ा डर कर रह जाता और मन ही मन सोचता की भगवान करे आज ठीक हो जाए, ख़ुद को बड़ा गंदा सा लगता था. ये कहां से आ रहा है मुझे बिलकुल समझ नहीं आ रहा था तब तक,…… ,वजाइना जैसे शब्द नहीं पता थे मुझे.

आज तो हद हो गयी …, दिमाग़ खराब हो गया. इसमें तो ब्लड आ रहा है.ये क्या हुआ? हे भगवान मुझे समझ क्यूं नहीं आया था की कोई बड़ी बीमारी होने वाली है, क्यूं मैं इतनी लापरवाह हो गयी ? क्यूं मम्मी से मैंने नहीं बताया था जब पहली बार गीला महसूस हुआ था? अब तो लगता है ये लास्ट स्टेज है, ज़रूर कैंसर ही हुआ होगा. अब मैं नहीं बचूँगी….डर के मारे ज़ोर ज़ोर से रोने लगी . कुछ समझ नहीं आ रहा था. किसी तरह हिम्मत करके मम्मी के पास पहुँची.चिपक कर ख़ूब रोयी मम्मी से.

“क्या हुआ बेटा”? मम्मी ने पूछा.” मम्मी
“मुझे ब्लीडिंग हो रही है”…. सुबकते हुए बोला .
“ये तो रुक भी नहीं रही” दूर ज़ोर ज़ोर से रोना शुरू कर दिया.” ये तो सबको होती है एक उम्र के बाद बेटा ये तो नोर्मल है” मम्मी ने प्यार से बोला.
“सबको …?” मैंने गर्दन ऊपर उठायी.
“ब्लड का आना नोर्मल कैसे हो सकता है?” मन ही मन सोचा पर नहीं बोल पायी.

मम्मी बड़ी सारी सलाहें दे डाली. इसके बारे में ज़्यादा बातें नहीं करना, कोई समस्या हो तो मुझसे अलग से बात कर लेना. पापा या भाई को पता न चले..,और पता नहीं कितनी नसीहतें….डरी सहमी सी मैं मन में ढेरों सवाल लिए बैठी थी. मगर कुछ भी पूछना नहीं चाहती थी.कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. मुझे आज समझ आया की दीदी उस दिन ऐसे क्यूँ बीहेव कर रही थी.मम्मी अंदर गयींऔर कपड़े का एक पैड बनाते हुए बाहर निकली, मुझे सिखा रहीं थी कि कैसे बनाना और यूज करना है. किसी काम में मन नहीं लग रहा था, बार बार वॉशरूम जा रही थी. सारा दिन उछलने कूदने वाली एक शरारती लड़की आज घर के किसी कोने में छुपकर बैठना चाहती थी.

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मन में बहुत सारे सवाल और चिढ़ भी थी. मन तो कर रहा था ज़ोर ज़ोर से चिल्लाऊँ ” क्यूँ सहूँ मैं ये सब, मुझे तो पीरियड नहीं चाहिये. मुझे नहीं बनना लड़की.इतना सब मेरे किए ही क्यूँ?

जी हाँ, ऐसे ही होती है menarche(माहवारी की शुरुआत ) 80% लड़कियों के साथ हमारे देश में .

आज अचानक मैं बड़ी हो गयी थी. मुझे बारे छिपाना आ गया था, अपनी शर्म और डर को छिपाने की एक्टिंग करना आ गया था. खेलने नहीं जाना होता पीरियड्स में इसे में बहानों से छिपा लेती थी. छुट्टियों में मम्मी के बिना कहीं नहीं जाना चाहती थी.
“किसी को पता न चल जाए” का भूत मेरे सिर पर बिठा दिया गया था. मेरा पूरा ध्यान इसी में लगा रहता था.कुछ लड़कियाँ अगर इस बारे में बात करना भी चाहें तो मैं वहाँ से उठ जाती थी. अगर स्कूल में पीरियड और सैनिटेशन पर मूवी दिखाते तो मेरी ज़्यादा अटेन्शन इस बात में थी की किसी को पता ना चल जाए की मैं इस के बारे में जानती हूँ.अगर कहीं निशान लग जाए तो रंग सफ़ेद पड़ जाता, वॉशरूम से बाहर निकलने का मन नहीं होता था.दीवार से चिपककर कर चलती, या निशान पर चॉक रगड़ती रहती . वो बेताल मुझे ऐसा ही करने के लिए कहता .एक बार अचानक से पीरियड शुरू हो गए थे, मैं घबरा गयी कुछ समझ नहीं आया क्या करूँ? बोर्ड साफ़ करने वाला डस्टर उठाया, बहुत ख़राब लगा, मगर कुछ उपाय नहीं दिखा. उस पर अपना रुमाल लपेटा और इस्तेमाल किया.इतने दिन तक चकत्ते झेलने पड़े थे सही से चल भी नहीं पायी थी कई दिन तक. बहुत रोयी थी उस दिन…..ये सब ज़िंदगी का हिस्सा बन गए थे जैसे. इस बेताल ने मेरी हँसी और खेल छीन लिया था ……..

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ऐसा ही होता है ज़्यादातर लड़कियों के साथ.आज भी.ये बात कभी समझ नहीं आयी की “जब हर लड़की को होता है, तो हम छुपा किससे रहे होते हैं?”
क्यूँ ये बेताल सिर पर बैठा होता है?
“अगर ये नोर्मल है, भगवान ने दिया है तो हमें शर्म क्यूँ आनी चाहिये?”
“क्या ये किसी को भी पसंद नहीं , या बस मेरे साथ ही ऐसा होता है?”
“मैं क्यूँ ना जाऊँ मन्दिर?”
“क्यूँ ना धोऊँ बाल ?”
या ” क्यूँ ना छूँऊ अचार?”
और जाने क्या क्या …..

ये सवाल सिर्फ़ मेरे नहीं हैं, ये पीढ़ियों से चले आ रहे हैं. कुछ साल परेशान करते हैं ये सवाल, फिर नियति बन जाते हैं. और अगली पीढ़ी पर थोप दिए जाते हैं.
ऐसा ही होता आ रहा है सदियों से. फिर जवाब कहाँ हैं?
जवाब पाने के लिए सवालों को ज़िन्दा रखना होगा.और बार बार पूछना होगा ख़ुद से ही और समाज से भी.

“सच्ची सहेली” का सेशन अटेंड करके मुझे अपने सवालों के जवाब मिल गए. इतनी ख़ुशी हुई जानकार की, कोई तो इस सवाल से भागा नहीं, सारे सवालों के जवाब आख़िर ढूँढ ही लिए.
मैंने भी सोच लिया की मैं अब ये सारे जवाब हर लड़की तक पहुंचाउंगी जो आज भी इन सवालों से जूझ रही है.
“अब मैं भी हूँ सच्ची सहेली”……